Last Updated Feb - 25 - 2026, 03:08 PM | Source : Fela News
भारत और इजरायल संबंधों के तीन चरणों पर आधारित विश्लेषण में शुरुआती दूरी के कारण छूटे रणनीतिक अवसरों और मौजूदा रक्षा-तकनीकी सहयोग की बढ़ती मजबूती पर चर्चा की गई है।
भारत और इजरायल के संबंधों को व्यापक रूप से तीन चरणों में समझा जाता है, 1950 से 1992 तक का सीमित संपर्क वाला दौर, 1992 से 2017 तक औपचारिक रिश्तों का विकास, और 2017 के बाद का समय जब साझेदारी में स्पष्ट गर्मजोशी दिखाई दी। 17 सितंबर 1950 को भारत ने इजरायल को मान्यता तो दे दी, लेकिन लंबे समय तक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए गए। करीब 42 वर्षों तक दोनों देशों के बीच संबंध सीमित रहे।
बताया जा रहा है कि उस दौर में भारत की विदेश नीति पर नैतिक दृष्टिकोण, उपनिवेशवाद विरोध और फिलिस्तीन समर्थन का प्रभाव था। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के बंटवारे के प्रस्ताव का विरोध किया और बाद में फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन को मान्यता दी। वहीं दूसरी ओर भारत अरब देशों के साथ संबंध मजबूत रखना चाहता था, जिसमें तेल की जरूरत और खाड़ी क्षेत्र में रोजगार संभावनाएं भी प्रमुख कारण बताए गए।
हालांकि समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि दूरी बनाए रखने से भारत को अपेक्षित कूटनीतिक लाभ नहीं मिला। कश्मीर मुद्दे पर अरब देशों से निर्णायक समर्थन नहीं मिला और इस्लामिक सहयोग संगठन में भी भारत को जगह नहीं मिली। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल के हवाले से कहा गया कि फिलिस्तीन पर भारत के समर्थन के बावजूद बदले में ठोस समर्थन नहीं मिला।
इस बीच विश्लेषण में यह भी उल्लेख किया गया कि रक्षा तकनीक और खुफिया सहयोग के क्षेत्र में भारत कई अवसर खो बैठा। 1962 के चीन युद्ध तथा 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों के दौरान इजरायल ने सीमित लेकिन महत्वपूर्ण सैन्य सहायता दी। 1980 के दशक में आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक की जरूरत भी महसूस हुई।
1992 में शीत युद्ध समाप्त होने और वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने के बाद दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए। इसके बाद रक्षा, कृषि और जल प्रबंधन सहित कई क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ा। 1999 के करगिल युद्ध के दौरान इजरायल द्वारा उपलब्ध कराए गए ड्रोन और लेजर गाइडेड सिस्टम का भी उल्लेख किया गया है।
2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को संबंधों में निर्णायक मोड़ बताया गया, जब भारत ने इस साझेदारी को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बढ़ते संपर्क ने रणनीतिक भरोसे को मजबूत किया।
रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में भारत इजरायल का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार है और दोनों देशों के बीच बहु-अरब डॉलर रक्षा सौदों, संयुक्त अनुसंधान और ‘मेक इन इंडिया’ परियोजनाओं पर काम चल रहा है। विश्लेषण में निष्कर्ष दिया गया कि 42 वर्षों की दूरी ने समय जरूर लिया, लेकिन वर्तमान साझेदारी दोनों देशों के लिए लाभकारी स्थिति में पहुंच चुकी है।
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