Last Updated Oct - 10 - 2025, 06:00 PM | Source : Fela News
लखनऊ में हुई बसपा की महारैली में मायावती ने कई बड़े ऐलान किए और विपक्षी दलों पर तीखे हमले बोले। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रैली में जितनी जोरदा
लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की महारैली ने राजनीतिक हलकों में फिर से हलचल मचा दी है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने मंच से केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर तीखे प्रहार किए और दावा किया कि आने वाले चुनावों में बसपा ही असली विकल्प बनकर उभरेगी। उन्होंने कहा कि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के हक की लड़ाई बसपा ही लड़ेगी, न कि वो दल जो सिर्फ चुनावी वादों में व्यस्त रहते हैं।
मायावती ने अपनी रैली में जनता के बीच कई घोषणाएं कीं—जैसे गरीबों के लिए विशेष रोजगार योजनाएं, शिक्षा में आरक्षण को और सशक्त बनाने की बात और कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त नीति अपनाने का वादा। लेकिन साथ ही उन्होंने विपक्षी दलों, खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, पर निशाना साधते हुए कहा कि ये पार्टियां बसपा के जनाधार को तोड़ने की साजिश कर रही हैं।
हालांकि रैली के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती के भाषण में जोश तो था, लेकिन रणनीति साफ नहीं दिखी। पिछले कुछ चुनावों से बसपा का वोट शेयर लगातार घट रहा है और मैदान पर उसकी सक्रियता सीमित होती जा रही है। ऐसे में यह रैली मायावती के लिए जनसमर्थन मापने का बड़ा मौका थी, जो कुछ हद तक प्रतीकात्मक ही लग रही है।
कई लोगों का कहना है कि मायावती ने अपने भाषण में जहां विरोधियों पर हमला बोला, वहीं पार्टी की आंतरिक चुनौतियों और संगठन की कमजोरी पर ज़्यादा बात नहीं की। यही वजह है कि इसे राजनीतिक तौर पर “सेल्फगोल” बताया जा रहा है।
अब सवाल यही है कि क्या यह महारैली बसपा को फिर से उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूत स्थिति दिला पाएगी, या यह सिर्फ एक कोशिश बनकर रह जाएगी अपनी खोई हुई जमीन तलाशने की।