Last Updated May - 04 - 2026, 11:20 AM | Source : Fela News
Allahabad High Court News: सार्वजनिक जमीन पर नमाज की इजाजत मांगने वाली याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा- सरकारी भूमि किसी एक धर्म के इस्तेमाल के लिए आरक्षित नहीं हो सकती.
सार्वजनिक जमीन पर नमाज पढ़ने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी या सार्वजनिक भूमि किसी एक धर्म की नियमित धार्मिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं की जा सकती. संभल के असीन की याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब सार्वजनिक व्यवस्था में दखल नहीं है.
सार्वजनिक जमीन पर सभी का बराबर हक
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीजन बेंच ने कहा कि सार्वजनिक भूमि पर सभी नागरिकों का समान अधिकार होता है. ऐसे में किसी एक पक्ष को वहां नियमित नमाज या धार्मिक आयोजन की अनुमति नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने कहा कि कानून सार्वजनिक संपत्ति के एकतरफा धार्मिक उपयोग की इजाजत नहीं देता.
निजी पूजा और सार्वजनिक जमावड़े में फर्क
हाईकोर्ट ने कहा कि निजी परिसर में शांतिपूर्ण प्रार्थना या धार्मिक अनुष्ठान की सुरक्षा दी जा सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां बड़े पैमाने पर नियमित सामूहिक भीड़ जुटाने की खुली छूट मिल जाए. जैसे ही धार्मिक गतिविधि निजी दायरे से निकलकर सार्वजनिक प्रभाव पैदा करती है, राज्य को उसे नियंत्रित करने का अधिकार है.
ईद तक सीमित थी नमाज, अब नियमित अनुमति की मांग
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि संबंधित स्थान पर पहले सिर्फ ईद जैसे खास मौकों पर नमाज अदा होती थी. अब गांव के भीतर और बाहर के लोगों को जोड़कर नियमित सामूहिक नमाज की अनुमति मांगी जा रही थी. कोर्ट ने इसे पुरानी परंपरा की सुरक्षा नहीं बल्कि नई धार्मिक गतिविधि शुरू करने की कोशिश माना.
धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण अधिकार नहीं
कोर्ट ने बेहद साफ शब्दों में कहा कि धर्म का पालन करने का अधिकार पूर्ण नहीं है. यह सार्वजनिक व्यवस्था, दूसरे लोगों के अधिकार और कानून के अधीन है. कोई भी धार्मिक स्वतंत्रता इस तरह इस्तेमाल नहीं की जा सकती जिससे सार्वजनिक स्थान प्रभावित हो या दूसरे नागरिकों के अधिकारों में हस्तक्षेप हो.
अवैध बैनामे के सहारे नहीं मिलेगी इजाजत
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि सार्वजनिक जमीन का गलत तरीके से बैनामा कराकर वहां भीड़ इकट्ठा कर नमाज पढ़ने की मांग की जाती है तो ऐसा दावा कानूनन टिक नहीं सकता. यानी जमीन का स्वरूप बदलकर धार्मिक अधिकार नहीं हासिल किए जा सकते.
हाईकोर्ट का साफ संदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि निजी आस्था का सम्मान होगा, लेकिन सार्वजनिक जमीन पर किसी भी तरह का स्थायी धार्मिक कब्जा या नियमित धार्मिक जमावड़ा स्वीकार नहीं किया जाएगा. यह फैसला आने वाले समय में ऐसे कई मामलों के लिए मिसाल बन सकता है.
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