Last Updated Oct - 24 - 2025, 05:35 PM | Source : Fela News
बिहार की सियासत में एक बार फिर कर्पूरी ठाकुर का नाम चर्चा में है। महागठबंधन और एनडीए दोनों ही दल इस प्रतीक को अपने-अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में जुटे हैं।
बिहार की राजनीति में इस समय एक ही नाम सबसे ज्यादा गूंज रहा है , कर्पूरी ठाकुर। 2025 के चुनावी माहौल में एनडीए और महागठबंधन, दोनों ने इस नाम को अपने-अपने सियासी एजेंडे का केंद्र बना लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया रैली में भी कर्पूरी ठाकुर का जिक्र बार-बार हुआ, जबकि विपक्ष उन्हें “पिछड़ों के असली नेता” के रूप में सामने रख रहा है।
दरअसल, मोदी सरकार ने इसी साल कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का ऐलान किया था, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक ‘OBC वोट बैंक’ को साधने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। अब जब बिहार में चुनाव की तैयारियां तेज़ हैं, तो भाजपा इस प्रतीक को अपने पक्ष में मजबूत करने की कोशिश कर रही है। मोदी ने अपने भाषण में साफ कहा कि कर्पूरी ठाकुर का सम्मान “सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि मेहनतकश वर्ग का सम्मान” है।
वहीं, महागठबंधन ने इसे बीजेपी की “राजनीतिक चाल” बताया और तर्क दिया कि असली कर्पूरी ठाकुर की नीतियां आज भी केवल विपक्ष के एजेंडे में जिंदा हैं। राजद और जदयू लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वे ही उस सामाजिक न्याय की राजनीति के असली उत्तराधिकारी हैं, जिसे कर्पूरी ठाकुर ने शुरू किया था।
बिहार की राजनीति में ‘अति पिछड़ा वर्ग’ हमेशा से चुनावी गणित का निर्णायक हिस्सा रहा है। ऐसे में ठाकुर का नाम दोनों पक्षों के लिए एक भावनात्मक और राजनीतिक दोनों तरह का हथियार बन चुका है। एक ओर मोदी इस नाम से ‘सामाजिक सम्मान’ की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे ‘राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश’ बता रहा है।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कर्पूरी ठाकुर की विरासत किसके पक्ष में काम करती है — क्या मोदी की रणनीति इस प्रतीक को नया अर्थ दे पाएगी, या विपक्ष पुराने भरोसे के नाम पर जनता को अपनी ओर खींचने में सफल रहेगा। बिहार का मैदान तैयार है, और मोहरे अब सीधे ‘कर्पूरी ठाकुर’ के नाम पर सजने लगे हैं।