Last Updated Jan - 27 - 2026, 11:59 AM | Source : Fela News
यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने भरोसा दिलाया कि सभी आशंकाएं और भ्रांतियां जल्द दूर होंगी।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर देश की राजनीति में तीखी बहस शुरू हो गई है। अलग-अलग राज्यों और राजनीतिक दलों से इन नियमों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कहीं इसे सामाजिक न्याय से जोड़कर देखा जा रहा है तो कहीं इसे भेदभावपूर्ण बताया जा रहा है। इस पूरे विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी के सांसद Nishikant Dubey सामने आए हैं और उन्होंने कहा है कि UGC की अधिसूचना को लेकर फैली सभी भ्रांतियों को दूर किया जाएगा।
निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर लिखा कि "मोदी है तो मुमकिन है" और लोगों से विश्वास रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि UGC के नए नियमों को लेकर जो भ्रम फैलाया जा रहा है, वह जल्द समाप्त होगा। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला देते हुए कहा कि कानून की नजर में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग सभी समान हैं। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय का मतलब किसी एक वर्ग को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि सभी को बराबरी का अवसर देना है।
भाजपा सांसद ने यह भी कहा कि सामान्य वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल से मिला। उन्होंने दावा किया कि मंडल आयोग लागू होने के बाद कई सरकारें बनीं, लेकिन संतुलित और वास्तविक न्याय देने का काम मौजूदा सरकार ने किया। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि जैसे आरक्षण को लेकर भ्रम दूर हुआ, वैसे ही UGC के नियमों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की जाएगी।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इन नियमों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शिवसेना (यूबीटी) की सांसद Priyanka Chaturvedi ने कहा कि कैंपस में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव गलत है और भारत में छात्र पहले ही इसके दुष्परिणाम झेल चुके हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कानून को समावेशी नहीं होना चाहिए और यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि सभी को समान रूप से संरक्षण मिले। उन्होंने यह भी पूछा कि कानून के लागू होने में भेदभाव क्यों दिखता है और झूठे मामलों की स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि भेदभाव को परिभाषित करना बेहद जरूरी है। क्या यह शब्दों से होगा, कार्यों से या धारणाओं के आधार पर। उनके मुताबिक, कानून की प्रक्रिया स्पष्ट, सटीक और सभी के लिए समान होनी चाहिए। उन्होंने आग्रह किया कि या तो UGC की इस अधिसूचना को वापस लिया जाए या उसमें आवश्यक संशोधन किए जाएं, ताकि कैंपस का माहौल नकारात्मक न बने।
इस विवाद पर भीम आर्मी प्रमुख और नगीना से सांसद Chandrashekhar Azad ने भी कड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि विरोध वही लोग कर रहे हैं जो जाति के आधार पर शोषण करना चाहते हैं। उनका कहना था कि अगर कुछ चुनिंदा लोगों के दबाव में यह फैसला वापस लिया गया, तो देश की 85 प्रतिशत आबादी सड़कों पर उतरने को मजबूर होगी।
वहीं उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री Keshav Prasad Maurya ने कहा कि सवर्ण समाज नाराज़ नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की नीतियों का उद्देश्य किसी वर्ग को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि उन तबकों को आगे बढ़ाना है जो ऐतिहासिक रूप से पीछे रह गए हैं। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय की प्रक्रिया में संतुलन जरूरी है और सरकार उसी दिशा में काम कर रही है।
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