Last Updated Feb - 03 - 2026, 06:19 PM | Source : Fela News
राजस्थान का पुराना नाम राजपूताना था। प्राचीन सभ्यताओं, राजपूत शौर्य, ब्रिटिशकालीन संधियों और आजादी के बाद हुए एकीकरण ने इसे आज के रंग-बिरंगे राजस्थान में ढाला।
क्षेत्रफल के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा राज्य राजस्थान केवल भौगोलिक विस्तार के कारण नहीं, बल्कि अपने गहरे इतिहास, जीवंत परंपराओं और लोक-संस्कृति के कारण भी विशेष पहचान रखता है। आज जिसे हम राजस्थान के नाम से जानते हैं, उसका पुराना नाम 'राजपूताना' था। यह नाम ही अपने भीतर उस गौरवशाली अतीत की झलक देता है, जब इस क्षेत्र पर सदियों तक राजपूत शासकों का प्रभाव रहा। राजाओं-महाराजाओं, किलों-महलों, वीरता की गाथाओं और रंग-बिरंगी परंपराओं ने मिलकर इस धरती को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान दी।
राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल तक जाता है। यहां सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष मिले हैं, जो बताते हैं कि यह क्षेत्र हजारों साल पहले भी विकसित मानवीय गतिविधियों का केंद्र था। समय के साथ यहां विभिन्न राजवंशों का उदय हुआ । 7वीं सदी के बाद चौहान वंश ने शक्ति प्राप्त की और 12वीं सदी तक एक प्रमुख सत्ता बन गया। इसके बाद मेवाड़ के गुहिलोत, मारवाड़ के राठौड़, आमेर जयपुर के कछवाहा, बूंदी-कोटा के हाड़ा, भरतपुर और अलवर जैसे अनेक रजवाड़ों ने अपनी-अपनी पहचान बनाई।
ब्रिटिश काल में 1818 के आसपास इन रियासतों ने अंग्रेजों के साथ संधियां कीं और 'राजपूताना एजेंसी' के तहत आ गईं। हालांकि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद के राष्ट्रीय आंदोलन ने यहां भी आजादी की चेतना जगाई । महात्मा गांधी के नेतृत्व में लोग संगठित हुए और स्वतंत्रता की लड़ाई में सक्रिय भागीदारी निभाई।
स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ी चुनौती इन रियासतों को एक सूत्र में पिरोने की थी। 1948 में 'मत्स्य संघ' का गठन हुआ। इसके बाद 1949 तक बीकानेर, जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर सहित कई रियासतें इसमें शामिल हुईं और 'ग्रेटर राजस्थान' का स्वरूप बना। आगे चलकर अजमेर, अबू रोड और सुनेल टप्पा भी इसमें जोड़े गए। इस प्रकार वर्तमान राजस्थान का गठन हुआ, जो पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से घिरा है।
राजस्थान को 'त्योहारों और मेलों की भूमि' यूं ही नहीं कहा जाता। यहां वर्षभर लोक उत्सवों की धूम रहती है। तीज और गणगौर (जयपुर) में नारी शक्ति और सौंदर्य का उत्सव दिखता है। अजमेर शरीफ और गलियाकोट का उर्स सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। डूंगरपुर का बेणेश्वर मेला आदिवासी संस्कृति का विशाल संगम है।
पुष्कर का कार्तिक मेला और पशु मेला, रामदेवरा (जैसलमेर), सवाई माधोपुर का श्रीमहावीरजी मेला, सीकर का श्यामजी मेला- ये सभी राजस्थान की जीवंत लोक परंपरा के उदाहरण हैं।
आज राजस्थान अपने इतिहास, स्थापत्य, लोक-संगीत, नृत्य, वेशभूषा और मेलों-त्योहारों के कारण दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है । 'राजपूताना' से 'राजस्थान' बनने की यह यात्रा केवल नाम बदलने की कहानी नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा, वीरता, एकीकरण और जीवंत लोकजीवन की कहानी है।
यही वजह है कि राजस्थान को राजाओं की भूमि के साथ-साथ त्योहारों और मेलों की भूमि भी कहा जाता है।
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