Last Updated Apr - 08 - 2026, 12:23 PM | Source : Fela News
Sabrimala Temple Case: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला सुनवाई जारी, फैसले पर नहीं बल्कि 7 अहम संवैधानिक सवालों पर हो रही बहस, मामला फिर गरमाया, देशभर की नजरें कोर्ट की कार्यवाही पर टिकीं
धार्मिक परंपराओं और महिला अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार से ऐतिहासिक सुनवाई शुरू हो गई है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पहले दिन सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा और धार्मिक स्थलों के नियमों में सीमित हस्तक्षेप की बात कही।
सबरीमाला से शुरू हुआ, लेकिन दायरा काफी बड़ा
यह मामला भले ही केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा हो, लेकिन इसकी पहुंच अब कई धार्मिक और सामाजिक मुद्दों तक फैल चुकी है। भगवान अयप्पा के ब्रह्मचारी होने की मान्यता के चलते 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया था। इस फैसले के बाद केरल में भारी विरोध हुआ और कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनके आधार पर अब यह सुनवाई हो रही है।
फैसले पर नहीं, 7 संवैधानिक सवालों पर बहस
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस बार सीधे 2018 के फैसले की समीक्षा नहीं कर रहा, बल्कि 2019 में तय किए गए 7 बड़े संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रहा है। ये सवाल सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों में अधिकार और दाउदी वोहरा समुदाय में महिलाओं से जुड़े मुद्दों तक फैले हुए हैं।
SG तुषार मेहता का बड़ा बयान
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि भारत में हर धर्म और संप्रदाय के अपने नियम और परंपराएं होती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अदालतें यह तय कर सकती हैं कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “अनिवार्य” है? मेहता ने 1954 के शिरूर मठ केस का हवाला देते हुए कहा कि केवल आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को ही संवैधानिक संरक्षण दिया जाना चाहिए, लेकिन उनकी पहचान करना आसान नहीं है।
परंपरा बनाम आधुनिक सोच की बहस
मेहता ने यह भी कहा कि भारत में महिलाओं को हमेशा उच्च स्थान दिया गया है और हर मुद्दे को पितृसत्ता से जोड़कर देखना पश्चिमी सोच का असर है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आधुनिक विचारधारा के आधार पर धार्मिक परंपराओं में बदलाव किया जाना चाहिए और क्या अदालत को ऐसा करने का अधिकार है?
जजों के तीखे सवाल, छुआछूत पर भी बहस
सुनवाई के दौरान जजों ने भी कई अहम सवाल उठाए। जस्टिस बी वी नागरत्ना ने 2018 के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक को छुआछूत के रूप में देखा गया था। इस पर मेहता ने जवाब दिया कि मंदिर की विशिष्ट परंपरा को छुआछूत से जोड़ना गलत है और दोनों की तुलना उचित नहीं है।
कई मामलों पर पड़ेगा असर
इस सुनवाई का असर सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में धार्मिक अधिकारों और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई मामलों पर पड़ेगा। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी है, जो भविष्य की दिशा तय कर सकता है।
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