Last Updated Apr - 24 - 2026, 01:01 PM | Source : Fela News
महिलाओं के मस्जिद प्रवेश पर बहस तेज, शमशाद ने सुप्रीम कोर्ट के इस्माइल फारूकी फैसले का हवाला देते हुए कहा—नमाज के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं, मुद्दा फिर गरमाया।
मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने की अनुमति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अहम बहस देखने को मिली। एक मुस्लिम संस्था की ओर से वरिष्ठ वकील एम. आर. शमशाद ने दलील दी कि इस्लाम में महिलाओं के लिए मस्जिद जाकर नमाज पढ़ना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि महिलाएं घर पर नमाज अदा करें तो भी उन्हें समान पुण्य मिलता है।
इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने सवाल उठाते हुए कहा कि हदीस में महिलाओं के घर पर नमाज पढ़ने के पीछे का कारण भी समझना जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया कि परिवार और बच्चों की देखभाल भी एक अहम वजह मानी जाती रही है।
मस्जिद की अनिवार्यता पर कानूनी बहस
सुनवाई के दौरान शमशाद ने इस्माइल फारूकी केस का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि नमाज के लिए मस्जिद का होना अनिवार्य नहीं है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह तर्क कुछ वैसा ही है जैसे यह कहना कि हिंदू धर्म में मंदिर अनिवार्य नहीं है।
महिलाओं के प्रवेश पर क्या है स्थिति?
बहस के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है। शमशाद ने कहा कि सभी संप्रदाय इस बात से सहमत हैं कि महिलाओं को मस्जिद आने से रोका नहीं जा सकता, हालांकि जमात में उनकी उपस्थिति अनिवार्य नहीं मानी गई है।
सुनवाई में यह भी बताया गया कि पैगंबर मोहम्मद ने खुद महिलाओं को मस्जिद आने से न रोकने की बात कही थी। अब यह मामला धार्मिक परंपरा, अधिकार और समानता के बीच संतुलन को लेकर एक अहम कानूनी बहस बन चुका है।
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