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मस्जिद में नमाज पर सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी, बच्चों की देखभाल सवाल बना

मस्जिद में नमाज पर सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी, बच्चों की देखभाल सवाल बना

Last Updated Apr - 24 - 2026, 03:59 PM | Source : Fela News

सबरीमाला मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद प्रवेश पर बहस तेज, जस्टिस अमानुल्लाह ने बच्चों की देखभाल का मुद्दा उठाया, इस्माइल फारूकी फैसले पर भी सवाल उठे
मस्जिद में नमाज पर सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी
मस्जिद में नमाज पर सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच में चल रही सुनवाई अब दूसरे धर्मों तक भी पहुंच गई है. इसी दौरान मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने के अधिकार पर अहम बहस देखने को मिली. सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने सवाल उठाया कि अगर घर के सभी सदस्य नमाज के लिए मस्जिद चले जाएं, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?

उन्होंने कहा कि इस्लाम में महिलाओं के घर पर नमाज पढ़ने को प्राथमिकता देने के पीछे यही एक व्यावहारिक कारण माना जाता है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पैगंबर के समय से ही महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने पर कोई रोक नहीं रही है, लेकिन इसके लिए कुछ रीति-रिवाज तय थे.

मस्जिद में महिलाओं के अधिकार पर क्या कहा वकील ने?

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने दलील दी कि इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए नमाज पढ़ना जरूरी है, लेकिन मस्जिद में जाकर जमात का हिस्सा बनना अनिवार्य नहीं है. घर पर नमाज पढ़ने पर भी उन्हें समान धार्मिक फल मिलता है.

वकील ने यह भी कहा कि महिलाओं के लिए अलग स्थान की व्यवस्था धार्मिक परंपरा का हिस्सा है और इस पर अदालत को सवाल नहीं उठाना चाहिए.

इस्माइल फारूकी फैसले पर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान 1994 के इस्माइल फारूकी फैसले का भी जिक्र हुआ. शमशाद ने इस फैसले को रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि इसमें यह कहा गया था कि नमाज के लिए मस्जिद जरूरी नहीं है, जो इस्लाम की मूल भावना के खिलाफ है. उन्होंने तर्क दिया कि मस्जिद मुस्लिम आस्था का केंद्र है और धार्मिक गतिविधियों का अहम हिस्सा है.

क्या महिलाओं को मस्जिद में जाने की अनुमति है?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के सवाल पर वकील ने साफ किया कि इस्लाम के सभी संप्रदायों में महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश की अनुमति है. हालांकि, उनके लिए जमात में शामिल होना अनिवार्य नहीं माना गया है.

परंपरा और आधुनिक अधिकारों के बीच टकराव

सुनवाई में यह भी सामने आया कि महिलाओं की नमाज से जुड़ी परंपराएं करीब 1200 साल पुरानी हैं, जो पैगंबर के समय से चली आ रही हैं. जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि इन परंपराओं के पीछे सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी बड़ा कारण रहा है.

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में यह बहस आस्था, परंपरा और महिलाओं के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन तलाशने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिसका असर आने वाले समय में बड़े फैसले के रूप में सामने आ सकता है.

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