Last Updated Nov - 20 - 2025, 05:42 PM | Source : Fela News
तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया पर उठी नई बहस जैसे किसी पुरानी सामाजिक और कानूनी उलझन की परतें खोल रही हो। हर चरण के साथ इसमें छिपे रिश्तों, अधिकारों और विवादों की जटिल
तलाक-ए-हसन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की जटिलताओं को फिर उजागर कर दिया है। यह प्रथा तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत से अलग मानी जाती है, लेकिन इसके ढांचे और प्रभावों को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। सुन्नी मुस्लिमों में प्रचलित इस तरीके में पति लगातार तीन चक्रों में, आमतौर पर हर माह की एक तय अवधि पर, तलाक के शब्द उच्चारित करता है। अगर तीसरी बार तक पत्नी को वापस लेने या सुलह का कोई फैसला नहीं होता, तो रिश्ता औपचारिक रूप से खत्म माना जाता है।
समर्थकों का कहना है कि यह प्रथा सोच-समझकर फैसला लेने का समय देती है और जल्दबाज़ी या गुस्से में लिए निर्णयों से बचाती है। इसमें पति-पत्नी को बीच के दिनों में संवाद और मेल-मिलाप का अवसर मिलता है, जो इसे तत्काल तलाक की तुलना में ‘न्यायसंगत’ बनाता है।
लेकिन आलोचकों का तर्क है कि इसका नियंत्रण पूरी तरह पति के हाथ में रहना एक बड़ी कमी है। महिला पक्ष को पहल करने या प्रक्रिया को रोकने की शक्ति नहीं दी गई है, जिससे वैवाहिक अधिकारों और लैंगिक समानता पर सवाल उठते हैं। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि आज के दौर में ऐसी व्यवस्था कहीं न कहीं असमानता को वैध ठहराती है।
अब सुप्रीम कोर्ट यह जांच रहा है कि क्या तलाक-ए-हसन संवैधानिक मूल्यों, विशेषकर लैंगिक समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता—के अनुरूप है या नहीं। अदालत के सामने यह भी सवाल है कि धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच किस सीमा तक संतुलन बनाया जाए।
बहस जिस दिशा में बढ़ रही है, उससे लग रहा है कि यह मामला केवल एक धार्मिक प्रथा का नहीं, बल्कि उस बड़े सवाल का संकेत है, देश के व्यक्तिगत कानून समय के साथ कैसे बदलें और किसे बदलने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।