Last Updated Nov - 12 - 2025, 04:10 PM | Source : Fela News
पश्तूनों के दिल आज भी सरहद के उस पार बसते हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा ने उन्हें दो हिस्सों में बांट दिया, लेकिन रिश्तों की डोर अब भी मजबूत है।
1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब सिर्फ दो देशों की सीमाएं नहीं बनीं —एक पूरे समुदाय की पहचान भी बिखर गई। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच खिंची ‘ड्यूरंड लाइन’ ने पश्तूनों के मादरे वतन को दो हिस्सों में बांट दिया। यही लकीर आगे चलकर दक्षिण एशिया की राजनीति में तनाव का स्थायी कारण बनी, जिसे अफगानिस्तान आज तक स्वीकार नहीं कर पाया।
दरअसल, ड्यूरंड लाइन 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच खींची गई थी। ब्रिटिशों का उद्देश्य था —अफगान प्रभाव को सीमित करना और भारत की पश्चिमी सरहद को सुरक्षित बनाना। लेकिन जब ब्रिटिश शासन खत्म हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ, तब यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या यह सीमा समझौता अब भी वैध रहेगा। अफगानिस्तान का साफ रुख था —नहीं।
संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान ही वह पहला देश था जिसने पाकिस्तान की सदस्यता पर आपत्ति जताई थी। काबुल का तर्क था कि ड्यूरंड लाइन के पार रहने वाले पश्तून असल में अफगान वंशज हैं, जिनसे बिना राय लिए उन्हें पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया। अफगानिस्तान चाहता था कि इन इलाकों को स्वतंत्र ‘पश्तूनिस्तान’ घोषित किया जाए, ताकि वहां रहने वाले लोग अपनी राजनीतिक पहचान खुद तय कर सकें।
लेकिन पाकिस्तान ने इस विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया। नई सरकार का कहना था कि यह सीमा कानूनी रूप से तय हो चुकी है और इसे चुनौती देना भारत विभाजन की प्रक्रिया को ही अस्थिर करेगा। इसके बाद से ही अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते अविश्वास से भरे रहे।
आज भी अफगानिस्तान के कई हिस्सों में यह भावना गहराई तक मौजूद है कि ड्यूरंड लाइन सिर्फ एक भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक दर्द है —जिसने इतिहास, संस्कृति और परिवारों को दो टुकड़ों में बांट दिया। और यही वजह है कि हर बार जब सीमा पार तनाव बढ़ता है, तो पश्तूनों की वही पुरानी आवाज फिर गूंज उठती है — “हमारा घर किसी लकीर से अलग नहीं किया जा सकता।”