Last Updated Dec - 08 - 2025, 03:09 PM | Source : Fela News
वंदे मातरम् 19वीं सदी में जन्मा देशभक्ति गीत, जिसने स्वदेशी आंदोलन में ब्रिटिश राज के खिलाफ शक्तिशाली प्रतिरोध का प्रतीक रूप लिया.
वंदे मातरम् की शुरुआत 1870 के दशक में लेखनी के रूप में हुई, लेकिन उसका असली जुड़ाव देश के स्वतंत्रता आंदोलन से तब हुआ, जब वो एक चेतनापूर्ण नारा बना। यह गीत सबसे पहले लेखक Bankim Chandra Chatterjee ने अपने उपन्यास Anandamath (1882) में शामिल किया था।
इस कविता को पहली बार सार्वजनिक रूप से सामूहिक-गायन का स्वर 1896 में मिला, जब महान साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी Rabindranath Tagore ने Indian National Congress के कलकत्ता अधिवेशन में इस गीत को अपना स्वर दिया। उसी के बाद से वंदे मातरम् धीरे-धीरे देशभर में आज़ादी की चाहत और प्रतिरोध की आवाज़ बना गया।
लेकिन ब्रिटिश हुकूमत को यह गीत खटकने लगा, 1905 में बंगाल विभाजन के बाद, जब देशव्यापी स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, वंदे मातरम् को विरोध-प्रदर्शन और देशभक्ति का प्रतीक माना जाने लगा। इस वजह से ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक गायन पर रोक लगा दी। वंदे मातरम् और उपन्यास आनंदमठ, दोनों को प्रतिबंधित कर दिया गया।
फिर भी, इस बैन के बावजूद जनता ने इसे गुपचुप तरीकों से गाया, जुलूसों में, रैलियों में, जेलों में, स्कूल-कॉलेज की सभाओं में। इस तरह वंदे मातरम् बन गया ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का नारा, जिसने कई बार भूमिगत रूप से रोमांचक और प्रेरणादायक भूमिका निभाई।
इसके बाद, 1937 में Indian National Congress Working Committee ने यह तय किया कि सार्वजनिक और औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो छंदों का ही उपयोग किया जाएगा, ताकि धार्मिक या सांस्कृतिक विवादों से बचा जा सके।
आज, “वंदे मातरम्” न सिर्फ एक गीत है, बल्कि इतिहास की गूंज है, जिसने अंग्रेजों को झकझोरा, स्वतंत्रता के आंदोलन को ऊर्जा दी, और एक ऐसा प्रतीक बना जिसे आज भी कुछ लोग गर्व के साथ गाते हैं, तो कुछ लोग चिंतन के साथ देखते हैं।