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कांशीराम जयंती पर सपा-बसपा के बीच राजनीति क्यों गरम? मायावती क्यों खफा?

कांशीराम जयंती पर सपा-बसपा के बीच राजनीति क्यों गरम? मायावती क्यों खफा?

Last Updated Feb - 27 - 2026, 03:44 PM | Source : Fela News

सपा ने 15 मार्च को कांशीराम की जयंती ‘पीडीए दिवस’ के रूप में मनाने का ऐलान किया है, जिससे बसपा प्रमुख मायावती नाराज़ हैं और उन्होंने सपा पर तीखा हमला बोला है.
कांशीराम जयंती पर सपा-बसपा के बीच राजनीति क्यों गरम?
कांशीराम जयंती पर सपा-बसपा के बीच राजनीति क्यों गरम?

उत्तर प्रदेश में बसपा संस्थापक कांशीराम की विरासत को लेकर सियासत गरमाई है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने 15 मार्च को कांशीराम की जन्मतिथि को ‘बहुजन समाज दिवस’ या PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) दिवस के रूप में राज्यभर के जिलों में मनाने का निर्देश दिया है, ताकि दलित और पिछड़ों तक अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत की जा सके. रिपोर्ट के अनुसार सपा इसे अपने ‘मिशन कांशीराम’ के तहत दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में जोड़ने की रणनीति का हिस्सा बता रही है. 

कांशीराम ने बसपा का गठन किया था और उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति को उभारने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिसके बल पर Mayawati चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं. सपा चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाकर कांशीराम की जयंती को PDA दिवस के रूप में मनाने की तैयारी कर रही है, ताकि दलित और पिछड़ों के बीच राजनीतिक संबंध मजबूत हो सकें. 

मायावती ने इस कदम को सपा की “घोर अवसरवाद” और “राजनीतिक नाटकबाजी” करार दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि सपा का चरित्र और चेहरा हमेशा से दलित, OBC और बहुजन समाज विरोधी रहा है और PDA दिवस का आयोजन केवल वोटबैंक हासिल करने का राजनीतिक उपाय है. मायावती ने कहा कि सपा की यह चाल केवल चुनावी स्वार्थ के लिए है और इसमें कोई सच्ची भावना नहीं है. 

बसपा प्रदेश अध्यक्ष ने भी सपा के PDA के नारे पर सवाल उठाते हुए इसे ‘परिवार दल अलायंस’ बताया और सपा के नेतृत्व पर परिवार आधारित राजनीति करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि PDA का मतलब सिर्फ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक ही नहीं है, बल्कि सपा परिवार के कई गुटों और रिश्तों को जोड़ने की कोशिश है, जो इस पहल की सच्चाई पर सवाल उठाता है. 

मायावती ने यह भी याद दिलाया कि सपा प्रभाव वाली सरकारों ने कांशीराम के नाम पर बने जिलों या संस्थानों के नाम बदल दिए थे, जिससे कांशीराम की विरासत को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा. उनकी यह नाराज़गी यह संकेत देती है कि वे कांशीराम के राजनीतिक आदर्शों को सपा के ‘पीडीए दिवस’ कार्यक्रम से जोड़ने के प्रयास को स्वीकार नहीं कर रही हैं. 

इस तरह कांशीराम की जयंती को लेकर सपा और बसपा के बीच सियासी टकराव गहराता जा रहा है, जिसमें दोनों पार्टियाँ दलित और पिछड़े वर्ग के समर्थन को अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं.  

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