Last Updated Sep - 15 - 2025, 03:10 PM | Source : Fela News
बिहार में निर्दलीयों का कद इसलिए घट रहा है क्योंकि बड़े राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ गया है, चुनावी रणनीति और संसाधनों में उनकी ताकत ज्यादा है, और मतदाता अब मुख्
बिहार की सियासत में कभी निर्दलीय उम्मीदवारों का जलवा खूब चलता था। यहां तक कि महामाया प्रसाद सिन्हा जैसे नेता निर्दलीय रहते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए थे। लेकिन आज हालत यह है कि विधानसभा में निर्दलीयों की मौजूदगी लगभग 'बंजर' हो गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दलों की मजबूती और गठबंधन की राजनीति है। अब बड़े दल टिकट बंटवारे में जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय ताकतों का खास ध्यान रखते हैं, जिससे निर्दलीयों के लिए जगह बहुत कम रह गई है। इसके अलावा चुनाव में लगने वाला भारी खर्च भी निर्दलीय नेताओं के लिए चुनौती बन गया है।
कभी गांव-गांव में लोकप्रियता के दम पर जीतने वाले निर्दलीय अब बड़े राजनीतिक ब्रांड और पार्टी मशीनरी के आगे कमजोर पड़ रहे हैं। यही कारण है कि जहां पहले निर्दलीय विधायक सत्ता समीकरण तय करते थे, वहीं अब उनका असर लगभग खत्म हो चुका है।
बिहार की मौजूदा राजनीति यह साफ इशारा करती है कि निर्दलीयों के लिए रास्ता दिन-ब-दिन और कठिन होता जा रहा है।