Last Updated Apr - 11 - 2025, 12:44 PM | Source : Fela News
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि पीड़िता ने खुद मुसीबत को बुलावा दिया। इस टिप्पणी से नया विवाद खड़ा हो गया है।
प्रयागराज – इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह द्वारा बलात्कार के एक आरोपी को जमानत दिए जाने के मामले में की गई टिप्पणी ने विवाद खड़ा कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि पीड़िता के आरोपों को सत्य भी मान लिया जाए, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि "उसने स्वयं ही मुसीबत को बुलावा दिया और वह स्वयं इसके लिए जिम्मेदार भी थी।"
यह टिप्पणी उस समय की गई जब न्यायालय ने दिसंबर 2024 में गिरफ्तार एक युवक को जमानत प्रदान की। आरोपी पर आरोप था कि उसने दिल्ली के हौज खास इलाके के एक बार में मुलाकात के बाद महिला के साथ दुष्कर्म किया।
क्या कहा कोर्ट ने?
अदालत ने अपने आदेश में कहा,
“इस अदालत का मानना है कि अगर पीड़िता के आरोपों को भी सही मान लिया जाए, तो यह कहा जा सकता है कि उसने स्वयं मुसीबत को न्योता दिया और वह स्वयं इसके लिए जिम्मेदार थी।”
कोर्ट ने आगे यह भी उल्लेख किया कि पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट में हाइमेन (कौमार्य झिल्ली) फटी हुई पाई गई थी, लेकिन डॉक्टर ने स्पष्ट रूप से यौन शोषण की कोई राय नहीं दी।
पीड़िता के बयान का हवाला
अदालत ने अपने निर्णय में यह भी जोड़ा कि पीड़िता ने अपने बयान में भी समान रुख अपनाया है, जिससे आरोपी को राहत मिलती है।
सोशल मीडिया और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं में आक्रोश
कोर्ट की इस टिप्पणी को लेकर महिला अधिकार संगठनों और सोशल मीडिया पर तीव्र प्रतिक्रिया सामने आई है। कई लोगों का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां पीड़िताओं को शर्मिंदा करने वाली होती हैं और इससे न्यायपालिका की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े होते हैं।
कानूनी विश्लेषकों की राय
कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की टिप्पणियों से "consent" और "responsibility" जैसे संवेदनशील मुद्दों की व्याख्या को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। वहीं, कुछ का कहना है कि अदालत को कानूनी दृष्टिकोण से परिस्थितियों का आंकलन करना पड़ता है, परंतु शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
यह मामला न केवल एक संवेदनशील आपराधिक आरोप की कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, बल्कि इसने न्यायपालिका की भाषा और उसके सामाजिक प्रभावों को लेकर एक बड़ी बहस भी छेड़ दी है। जहां एक ओर अदालत का काम न्याय करना है, वहीं उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि उसकी टिप्पणियां पीड़िता के सम्मान और गरिमा को ठेस न पहुँचाएं
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