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होली के रंगों की परंपरा कैसे और कब शुरू हुई

होली के रंगों की परंपरा कैसे और कब शुरू हुई

Last Updated Feb - 23 - 2026, 02:51 PM | Source : Fela News

होली की रंगभरी मस्ती के पीछे छिपी है पौराणिक कथाएं और प्राकृतिक रंगों की परंपरा. जानिए जब बाजार में रंग नहीं थे, तब कैसे मनाई जाती थी होली.
होली के रंगों की परंपरा कैसे और कब शुरू हुई
होली के रंगों की परंपरा कैसे और कब शुरू हुई

होली का नाम लेते ही मन में रंगों की बौछार, पिचकारियों की धूम और गुलाल से सजे चेहरे की तस्वीर उभर आती है. लेकिन इस रंगभरे त्योहार की जड़ें सिर्फ उत्सव और मस्ती तक सीमित नहीं हैं. इसके पीछे गहरी धार्मिक आस्था, पौराणिक कथाएं और प्रकृति से जुड़ी परंपराएं छिपी हैं. आज बाजार में तरह-तरह के केमिकल रंग उपलब्ध हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब होली पूरी तरह प्राकृतिक रंगों और फूलों से खेली जाती थी. 

होली की शुरुआत धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है. पहले दिन मनाया जाने वाला होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. इसकी कथा भक्त प्रह्लाद, उनके पिता हिरण्यकश्यप और बहन होलिका से जुड़ी है. मान्यता के अनुसार, प्रह्लाद की भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उन्हें जलाने की योजना बनाई, लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका अग्नि में भस्म हो गईं. तभी से होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई, जो हर साल फाल्गुन पूर्णिमा की रात को निभाई जाती है. 

रंगों वाली होली का संबंध श्रीकृष्ण और राधा की कथाओं से माना जाता है. ब्रज क्षेत्र में प्रचलित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण अपने सांवले रंग को लेकर चिंतित रहते थे. तब माता यशोदा ने उन्हें राधा के चेहरे पर रंग लगाने की सलाह दी. इसी प्रेमपूर्ण प्रसंग ने रंगों की होली की परंपरा को जन्म दिया. मथुरा, वृंदावन और बरसाना में आज भी यह परंपरा विशेष उत्साह के साथ निभाई जाती है. 

प्राचीन समय में जब बाजार में तैयार रंग उपलब्ध नहीं थे, तब लोग प्राकृतिक साधनों से रंग बनाते थे. टेसू या पलाश के फूलों को पानी में भिगोकर केसरिया रंग तैयार किया जाता था. हल्दी से पीला रंग बनाया जाता था और चंदन का लेप तिलक के रूप में लगाया जाता था. गुलाब, गेंदे और अन्य फूलों की पंखुड़ियों से फूलों की होली खेली जाती थी. ये रंग त्वचा के लिए सुरक्षित और सुगंधित होते थे. 

होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल का अवसर भी रही है. गांवों में लोग ढोलक और मंजीरे के साथ फाग गाते थे. घरों में गुझिया, मालपुआ और दही बड़े जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते थे. लोग पुराने मतभेद भुलाकर गले मिलते थे और रिश्तों में नई मिठास घोलते थे. 

समय के साथ बाजार में रासायनिक रंग आए और त्योहार का रूप बदलने लगा. हालांकि अब भी कई लोग प्राकृतिक रंगों की ओर लौटने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि परंपरा और सेहत दोनों सुरक्षित रह सकें. 

होली की परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि यह त्योहार केवल रंग लगाने का नहीं, बल्कि प्रेम, आस्था और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है. रंग बदलते रहे हैं, लेकिन त्योहार की भावना आज भी वही है – मिलजुलकर खुशियां मनाने की. 

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