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पुतिन के रूस में कम्युनिज़्म कितना बाकी रहा…लेनिन-स्टालिन की विरासत के बाद आज की रूस की विचारधारा किस दिशा में बह रही है

पुतिन के रूस में कम्युनिज़्म कितना बाकी रहा…लेनिन-स्टालिन की विरासत के बाद आज की रूस की विचारधारा किस दिशा में बह रही है

Last Updated Dec - 03 - 2025, 01:21 PM | Source : Fela News

पुतिन के दौर में रूस कम्युनिज़्म से हटकर राष्ट्रवाद और मजबूत केंद्रीकृत शासन की नई दिशा में बढ़ रहा है।
पुतिन के रूस में कम्युनिज़्म कितना बाकी रहा…
पुतिन के रूस में कम्युनिज़्म कितना बाकी रहा…

सोवियत संघ के दौर में रूस का नाम आते ही कम्युनिज़्म सबसे पहले दिमाग में आता था। लेनिन और स्टालिन ने जिस व्यवस्था को खड़ा किया, उसने दशकों तक दुनिया को दो हिस्सों में बांटकर रखा। लेकिन सोवियत संघ टूटने के बाद धीरे-धीरे रूस बदलता गया और व्लादिमीर पुतिन के दौर में तो यह बदलाव और भी स्पष्ट दिखने लगा। सवाल अब यह है कि क्या आधुनिक रूस में अभी भी कम्युनिज़्म का प्रभाव बचा है या यह पूरी तरह राष्ट्रीयता-केंद्रित देश बन चुका है।

सच्चाई यह है कि रूस आज कम्युनिस्ट शासन वाला देश नहीं है। वहां चुनाव, बहुदलीय राजनीति और पूंजी आधारित अर्थव्यवस्था मौजूद है। लेकिन इसके बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी और लेफ्ट विचारधारा का कुछ प्रभाव आज भी दिखाई देता है। रूस की कम्युनिस्ट पार्टी अभी भी संसद में सबसे बड़े विपक्षी दलों में शामिल है और ग्रामीण इलाकों में उसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। लोग सोवियत काल की यादों, सस्ते घर, मुफ्त स्वास्थ्य सेवा और समानता के विचार, को आज भी रोमांटिक अंदाज़ में याद करते हैं।

लेकिन पुतिन का रूस लेनिन या स्टालिन की राह पर नहीं चलता। पुतिन खुद को ना तो कम्युनिस्ट बताते हैं और ना ही पश्चिमी लोकतंत्र का समर्थक। उनकी राजनीति राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और “मजबूत रूस” की थीम पर आधारित है। राज्य का नियंत्रण बढ़ा है, लेकिन यह नियंत्रण पुराने सोवियत कम्युनिज़्म की तरह विचारधारा नहीं, बल्कि सत्ता मॉडल के रूप में दिखता है, जहां सरकार केंद्र में है और स्थिरता को सर्वोच्च माना जाता है।

आर्थिक ढांचे में भी रूस अब समाजवादी नहीं रहा। निजी कंपनियों, विदेशी निवेश और बाजार आधारित व्यवस्था ने सोवियत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की जगह ले ली है। हां, कुछ बड़े सेक्टरों, जैसे ऊर्जा—पर सरकारी पकड़ जरूर है, लेकिन यह राष्ट्रीय सुरक्षा मॉडल का हिस्सा माना जाता है, न कि साम्यवादी संरचना का।

फिर भी रूसी समाज में कम्युनिस्ट सोच पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बुजुर्ग पीढ़ी सोवियत दौर को “स्थिरता और समानता” के रूप में याद करती है, जबकि युवा पीढ़ी उसे इतिहास की किताबों के ज़रिए जानती है। लेकिन राजनीतिक रूप से आज की असल तस्वीर यही है कि रूस अब लेफ्ट विचारधारा की जमीन पर नहीं बल्कि मज़बूत नेतृत्व, राष्ट्रीय शक्ति और भू-राजनीतिक प्रभुत्व पर खड़ा है।

पुतिन की भारत यात्रा से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि रूस आज कम्युनिस्ट देश नहीं, एक अलग, मिश्रित और खुद की नई विचारधारा वाला राष्ट्र बन चुका है,जहां सोवियत इतिहास सिर्फ स्मृति है, शासन का आधार नहीं।

 

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