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काबुल के सामने नरम पड़ा पाकिस्तान धमकी के बाद अब दिखी मिन्नत भरी जुबान

काबुल के सामने नरम पड़ा पाकिस्तान धमकी के बाद अब दिखी मिन्नत भरी जुबान

Last Updated Oct - 29 - 2025, 06:21 PM | Source : Fela News

तालिबान से टकराव के बाद पाकिस्तान का लहजा बदला, ECO बैठक में दिखी नरमी।
काबुल के सामने नरम पड़ा पाकिस्तान
काबुल के सामने नरम पड़ा पाकिस्तान

अफगानिस्तान के साथ रिश्तों में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान का रुख अचानक बदल गया है। जो पाकिस्तान कुछ दिन पहले तक तालिबान सरकार को कड़े शब्दों में चेतावनी दे रहा था, वही अब अफगानिस्तान के सामने नरम पड़ गया है। तुर्कमेनिस्तान में हुई ECO बैठक के दौरान पाकिस्तान के गृहमंत्री मोहसिन नक़वी ने बयान दिया कि “मतभेद तो हर घर में होते हैं”, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में अचानक नई चाल महसूस की जा रही है।

दरअसल, हाल ही में पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच सीमा पार आतंकवाद और TTP (तहरीक--तालिबान पाकिस्तान) को लेकर तनाव चरम पर पहुंच गया था। पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि अफगान धरती से उसके खिलाफ हमले किए जा रहे हैं, जबकि तालिबान ने इसे सिरे से नकार दिया था। इस विवाद ने दोनों पड़ोसियों के रिश्तों में ठंडक ला दी थी।

अब तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अश्गाबात में हुई इकोनॉमिक कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (ECO) की बैठक में पाकिस्तान ने लहजा बदलते हुए कहा कि “कभी-कभी गलतफहमियां हो जाती हैं, लेकिन हम अफगानिस्तान के साथ मजबूत और स्थायी रिश्ते चाहते हैं।” नक़वी ने यहां तक कहा कि “दोनों देश एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”

मोहम्मद इब्राहिम सादर, जो तालिबान सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधि हैं, उन्होंने भी पाकिस्तान के इस बयान का नरम जवाब दिया और कहा कि “अफगानिस्तान क्षेत्रीय स्थिरता के लिए पाकिस्तान के साथ काम करना चाहता है, लेकिन पारस्परिक सम्मान जरूरी है।”

विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान की यह झुकाव भरी रणनीति उसकी बढ़ती आंतरिक मुश्किलों का नतीजा है। आर्थिक संकट, बढ़ती आतंकी घटनाएं और सीमावर्ती अस्थिरता ने इस्लामाबाद को मजबूर कर दिया है कि वह काबुल से टकराव की बजाय संवाद की राह अपनाए।

हालांकि, अफगानिस्तान की तरफ से अब तक कोई स्पष्ट भरोसा नहीं दिया गया है। काबुल यह जताना चाहता है कि वह पाकिस्तान की शर्तों पर नहीं, बल्कि अपने नियमों के तहत बातचीत करेगा।

फिलहाल, पाकिस्तान का यह “मतभेद वाला बयान” उसके पुराने रुख से बिल्कुल अलग है, और यही वजह है कि काबुल से लेकर इस्लामाबाद तक अब चर्चा यही है, क्या पाकिस्तान का यह नरम स्वर नया अध्याय खोलेगा या सिर्फ हालात संभालने की एक अस्थायी कोशिश है।

 

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