Last Updated Feb - 10 - 2026, 01:41 PM | Source : Fela News
बांग्लादेश के 12 फरवरी 2026 के आम चुनावों से पहले राजनीतिक पटल पर बड़ा बदलाव हुआ है। अवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद मुकाबला BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच केंद्रित
बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल बेहद गतिशील और तनावपूर्ण है। पिछले साल जुलाई-अगस्त में बड़े स्तर पर जारी विरोध प्रदर्शन और सत्तारूढ़ पार्टी अवामी लीग के खिलाफ उग्र संकट के बाद देश में सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल गया है। इन परिस्थितियों में यह चुनाव बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा को तय करने के लिए निर्णायक माना जा रहा है।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि Nobel शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में चल रही अंतरिम सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर अलग-अलग आरोपों के कारण प्रतिबंध लगा दिया है और उसकी चुनाव कमिशन में पंजीकरण भी निलंबित कर दिया है, जिससे यह गठबंधन आगामी चुनाव में भाग नहीं ले पाएगा।
वर्तमान में चुनावी तैयारियाँ मुख्य रूप से दो बड़ी पार्टियों बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के बीच केंद्रित हो गई हैं। बीएनपी का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान कर रहे हैं। इसी तरह से जमात-ए-इस्लामी भी चुनावी तालमेल और गठबंधन के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है।
बीते कुछ सर्वे परिणामों के अनुसार BNP सामने चल रही है, लेकिन जमात-ए-इस्लामी भी तेजी से समर्थन बटोर रही है और यह मुकाबला बेहद करीबी दिख रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि अवामी लीग के बिना यह चुनाव पहले से कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी बन गया है, और मतदाता तंत्र की दिशा अब स्पष्ट तौर पर बदल सकती है।
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने चुनाव की तारीख तय कर दी है और उसने कहा है कि चुनाव आयोजित किया जाएगा, चाहे राजनीतिक तनाव कितना भी हो। यूनुस ने पहले कहा था कि चुनाव को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न कराया जाएगा। हालांकि, विपक्षी पार्टियों, विशेषकर जमात-ए-इस्लामी ने कहा है कि चुनाव केवल तभी वैध होगा जब वह निष्पक्ष होगा अन्यथा इसे रद्द किया जाना चाहिए।
अंतरिम सरकार के इस फैसले को बांग्लादेश के भीतर एक संभावित संकट के रूप में भी देखा जा रहा है। अवामी लीग के समर्थकों एवं पूर्व नेतृत्व का दावा है कि अवामी लीग का चुनाव से बाहर होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है और इससे राजनीतिक वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
इसके अलावा, देश में अल्पसंख्यकों के अधिकार, कानून-व्यवस्था, रोजगार, आर्थिक मुद्दे और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चुनावी बहस में शामिल हैं। संसदीय सीटों के लिए इस विस्तृत मुकाबले में हिंदू बहुल क्षेत्रों में भी BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच प्रतिस्पर्धा का माहौल दिख रहा है, जिससे मतदाताओं की भूमिका और भी निर्णायक बन गई है।
आगे का राजनीतिक परिदृश्य यह दिखा रहा है कि या तो BNP बहुमत लेकर सरकार बनाएगी, या जमात-ए-इस्लामी अपनी चुनावी ताकत के कारण गठबंधन का नेतृत्व कर सकता है। हालाँकि, देश की राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक वैधता पर इन चुनावों के परिणाम का व्यापक असर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश के इस चुनाव को अब सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा और भविष्य के राजनीतिक समीकरण तय करने वाला चुनाव माना जा रहा है।
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