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Somnath Mandir History: चंद्रदेव के श्राप से जुड़ा है सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का रहस्य

Somnath Mandir History: चंद्रदेव के श्राप से जुड़ा है सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का रहस्य

Last Updated May - 12 - 2026, 12:07 PM | Source : Fela News

Somnath Amrit Parv 2026: सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण के 75 साल पूरे होने पर जानिए उससे जुड़ा अद्भुत पौराणिक रहस्य. क्यों चंद्रदेव ने यहीं की थी तपस्या और कैसे बना यह पहला ज्योतिर्लिंग?
चंद्रदेव के श्राप से जुड़ा है सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का रहस्य
चंद्रदेव के श्राप से जुड़ा है सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का रहस्य

Somnath Mandir Jyotirlinga ki Kahani: आज से ठीक 75 साल पहले 11 मई 1951 को देश के सबसे प्राचीन और पवित्र मंदिरों में गिने जाने वाले सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था. अब इस ऐतिहासिक पल को ‘सोमनाथ अमृत पर्व’ के रूप में मनाया जा रहा है. इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कार्यक्रम में शामिल होंगे, जहां मंदिर के 90 मीटर ऊंचे शिखर का 11 पवित्र तीर्थों के जल से कुंभाभिषेक किया जाएगा.

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला और सबसे प्राचीन ज्योतिर्लिंग माना जाता है. यही वजह है कि इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व बाकी ज्योतिर्लिंगों से अलग माना जाता है.

क्यों खास है सोमनाथ ज्योतिर्लिंग?

हिंदू धर्म में ज्योतिर्लिंग भगवान शिव की अनंत शक्ति और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं. देशभर में 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं, लेकिन सोमनाथ को उनमें प्रथम स्थान प्राप्त है. प्रभास पाटन में स्थित यह मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है.

‘सोमनाथ’ शब्द का अर्थ होता है ‘सोम के नाथ’, यानी चंद्रमा के स्वामी. मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना खुद चंद्रदेव ने की थी. शिव पुराण और स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है.

चंद्रदेव और दक्ष प्रजापति की पौराणिक कथा

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे बेहद रोचक और रहस्यमयी कथा जुड़ी है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रदेव का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों से हुआ था, जिन्हें 27 नक्षत्रों का प्रतीक माना जाता है. लेकिन चंद्रदेव अपनी पत्नी रोहिणी से सबसे अधिक प्रेम करते थे और अधिकतर समय उन्हीं के साथ बिताते थे.

इससे बाकी पत्नियां दुखी हो गईं और उन्होंने अपने पिता दक्ष प्रजापति से शिकायत कर दी. दक्ष ने चंद्रदेव को सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करने को कहा, लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी. इससे क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि उनका तेज धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा.

तपस्या से बदली चंद्रदेव की किस्मत

श्राप के असर से चंद्रदेव कमजोर होने लगे और उनकी चमक फीकी पड़ने लगी. तब ब्रह्मदेव ने उन्हें भगवान शिव की आराधना करने की सलाह दी. इसके बाद चंद्रदेव प्रभास तट पहुंचे और वहां कठोर तपस्या शुरू की. कई वर्षों तक महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न किया.

भगवान शिव चंद्रदेव की तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे पूरी तरह श्रापमुक्त नहीं होंगे, लेकिन हर महीने 15 दिनों तक उनका तेज बढ़ेगा और फिर 15 दिनों तक घटेगा. यही कारण है कि आज भी चंद्रमा शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में घटता-बढ़ता दिखाई देता है.

ऐसे हुई पहले ज्योतिर्लिंग की स्थापना

कथा के अनुसार, श्राप से मुक्ति मिलने के बाद चंद्रदेव ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे प्रभास क्षेत्र में स्थापित उसी शिवलिंग में सदा के लिए विराजमान हो जाएं. भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और ज्योति स्वरूप में वहां स्थापित हो गए. तभी से यह स्थान ‘सोमनाथ ज्योतिर्लिंग’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया और इसे भगवान शिव का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाने लगा.

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