Last Updated Jan - 23 - 2026, 04:40 PM | Source : Fela News
2022 में प्रदूषण से हुई भारी मौतों को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए ठोस नीतिगत कदम उठ
2022 में प्रदूषण के कारण भारत में करीब 17 लाख लोगों की मौत होने के आंकड़ों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शहरीकरण, बढ़ता औद्योगिक उत्पादन, वाहनों की संख्या में तेज इजाफा और कोयले पर निर्भर ऊर्जा व्यवस्था इसके प्रमुख कारण हैं। बताया जा रहा है कि दिल्ली, उत्तर भारत के कई शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में साल के बड़े हिस्से में वायु गुणवत्ता सूचकांक खतरनाक स्तर पर रहता है। इस बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक जहरीली हवा में सांस लेने से हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारियां और स्ट्रोक का खतरा काफी बढ़ जाता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत को प्रदूषण नियंत्रण के मामले में चीन के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए। सूत्रों के अनुसार, चीन ने बीते एक दशक में कड़े पर्यावरणीय नियम, कोयले के उपयोग में कटौती और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर देकर अपनी वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि इसी तरह भारत को भी उद्योगों और परिवहन क्षेत्र में सख्त मानकों को लागू करना होगा।
वहीं दूसरी ओर, प्रशासन का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें प्रदूषण कम करने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत प्रदूषण प्रभावित शहरों में निगरानी और नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, सवाल उठाए जा रहे हैं कि मौजूदा प्रयास बढ़ती समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों ने भी भारत सहित अन्य विकासशील देशों से अपील की है कि वायु गुणवत्ता को प्राथमिकता देते हुए स्वास्थ्य नीतियों को मजबूत किया जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में प्रदूषण से जुड़ा स्वास्थ्य बोझ और अधिक बढ़ सकता है।
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