Last Updated Jan - 29 - 2026, 03:45 PM | Source : Fela News
महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार दशकों तक प्रभावशाली भूमिका में रहे। सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो, सत्ता संतुलन में उनका स्थान अहम माना जाता रहा।
महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार का नाम लंबे समय तक सत्ता के केंद्र के रूप में देखा गया। करीब 45 साल के राजनीतिक सफर में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन सत्ता संरचना में उनकी मौजूदगी लगातार बनी रही। बारामती से विधायक के तौर पर पहचान बनाने वाले अजित पवार ने राज्य की राजनीति में व्यावहारिक और निर्णायक नेता की छवि स्थापित की।
अजित पवार ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी और बाद में शरद पवार के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाई। सूत्रों के अनुसार संगठनात्मक मामलों और चुनावी रणनीति में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती थी। यही वजह रही कि पार्टी के भीतर और गठबंधन सरकारों में उनका कद लगातार बढ़ता गया।
इस बीच अजित पवार कई बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने। कांग्रेस-एनसीपी सरकार हो या बाद में बदले राजनीतिक समीकरण, सत्ता संतुलन में उनकी भूमिका निर्णायक रही। सवाल उठाए जाते रहे कि अलग-अलग सरकारों में भी उपमुख्यमंत्री पद पर उनकी निरंतरता कैसे बनी रही। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विधायकों पर उनकी पकड़ और जमीनी राजनीति की समझ ने उन्हें हर दौर में प्रासंगिक बनाए रखा।
वहीं दूसरी ओर उनका राजनीतिक जीवन विवादों से भी अछूता नहीं रहा। सिंचाई परियोजनाओं और प्रशासनिक फैसलों को लेकर उन पर आरोप लगे, जिनकी जांच भी हुई। हालांकि अजित पवार ने हमेशा आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया और कानूनी प्रक्रिया के जरिए जवाब देने की बात कही। प्रशासन का कहना रहा कि मामलों में नियमानुसार कार्रवाई की गई।
2019 और उसके बाद के वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े उलटफेर देखने को मिले। इस दौरान अजित पवार ने अलग रुख अपनाकर सभी को चौंकाया और सत्ता की नई संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद के वर्षों में एनसीपी के भीतर भी विभाजन हुआ, लेकिन इसके बावजूद वह राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री बने रहे।
बताया जा रहा है कि अजित पवार की राजनीति हमेशा सत्ता प्रबंधन और व्यावहारिक फैसलों के इर्द-गिर्द रही। समर्थक उन्हें विकासोन्मुख नेता मानते रहे, जबकि आलोचक उनकी राजनीति को अवसरवादी बताते रहे। बावजूद इसके, महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी 45 साल की मौजूदगी यह दिखाती है कि सत्ता के बदलते समीकरणों के बीच भी उन्होंने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखी।
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