Last Updated Apr - 01 - 2026, 11:32 AM | Source : Fela News
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण मालिक होती है. इसलिए उसके आभूषण ले जाने के आरोप में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि विवाह के दौरान महिला को दिया गया स्त्रीधन उसकी निजी संपत्ति होता है और उस पर उसका पूरा अधिकार होता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि स्त्रीधन को पति या ससुराल की संयुक्त संपत्ति नहीं माना जा सकता.
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति चवन प्रकाश की अदालत ने अनामिका तिवारी और चार अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई के दौरान की. अदालत ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जारी समन आदेश और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया.
मामले के अनुसार, महिला का विवाह अप्रैल 2012 में हुआ था. विवाह के बाद उसने अपने पति और ससुराल पक्ष के लोगों पर दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई थी. इस मामले में दिसंबर 2018 में पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया था.
इसके बाद महिला के पति ने भी एक शिकायत दर्ज कराई थी. इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सितंबर 2018 में पत्नी और उसके परिजन उसके घर में घुसे और 6,400 रुपये नकद, लगभग डेढ़ लाख रुपये के आभूषण तथा कुछ घरेलू सामान ले गए.
इसी शिकायत और गवाहों के बयानों के आधार पर मजिस्ट्रेट ने महिला और उसके परिवार के सदस्यों को समन जारी किया था, जिसके खिलाफ यह याचिका दाखिल की गई थी.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 405 और 406 की कानूनी व्याख्या पर भी चर्चा की. अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को कोई संपत्ति सौंपी जाती है और वह उसका दुरुपयोग करता है या उसे अपने निजी उपयोग में लेता है, तो यह आपराधिक विश्वासघात की श्रेणी में आता है.
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में स्थिति अलग है. कोर्ट ने कहा कि जब पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण स्वामिनी है, तो उसके द्वारा अपने आभूषण या संपत्ति को अपने साथ ले जाने को आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता.
इसी आधार पर अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है. अदालत ने कहा कि स्त्रीधन पूरी तरह से महिला की संपत्ति है और उस पर उसका अधिकार पूर्ण और स्वतंत्र होता है.
इस निर्णय के साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की. यह फैसला स्त्रीधन के अधिकार और उसकी कानूनी स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी माना जा रहा है.
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