Last Updated Feb - 21 - 2026, 01:09 PM | Source : Fela News
बिहार राज्यसभा चुनाव से पहले AIMIM ने उम्मीदवार उतारकर सियासी समीकरण बदल दिए हैं। इस फैसले से RJD की रणनीति पर असर पड़ा है और विपक्ष की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
बिहार में आगामी राज्यसभा चुनाव से पहले सियासी माहौल अचानक गर्म हो गया है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अपना उम्मीदवार उतारने का फैसला कर राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इस कदम को सीधे तौर पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के लिए बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि विपक्षी खेमे की रणनीति अब प्रभावित होती नजर आ रही है।
दरअसल, बिहार की पांच राज्यसभा सीटों के लिए 16 मार्च को चुनाव होने हैं। इन सीटों पर मौजूदा सांसदों के रिटायर होने के बाद चुनाव कराया जा रहा है। विधानसभा में संख्या बल के आधार पर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) चार सीटों पर अपनी जीत लगभग तय मान रहा है। वहीं, पांचवीं सीट को लेकर विपक्षी दलों के बीच रणनीति बन रही थी, लेकिन AIMIM के इस फैसले ने पूरे समीकरण को जटिल बना दिया है।
विधानसभा की वर्तमान स्थिति के अनुसार, एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 41 विधायकों के प्रथम वरीयता वोट की आवश्यकता होती है। विपक्षी महागठबंधन, जिसमें RJD, कांग्रेस और वाम दल शामिल हैं, के पास सीमित संख्या में विधायक हैं।
ऐसे में AIMIM के पांच विधायक निर्णायक भूमिका निभा सकते थे। उम्मीद की जा रही थी कि AIMIM विपक्षी उम्मीदवार का समर्थन कर सकती है, जिससे विपक्ष को पांचवीं सीट जीतने में मदद मिलती। लेकिन AIMIM द्वारा खुद का उम्मीदवार उतारने के फैसले ने विपक्षी एकता को कमजोर कर दिया है।
AIMIM के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी राज्यसभा चुनाव लड़ेगी और अपनी राजनीतिक ताकत दिखाएगी। उन्होंने अन्य विपक्षी दलों से समर्थन की अपील भी की है, लेकिन इस कदम को RJD के साथ पुराने मतभेदों से जोड़कर देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में AIMIM की स्वतंत्र पहचान मजबूत करने का प्रयास भी है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, AIMIM के इस फैसले से RJD की स्थिति कमजोर हो सकती है, क्योंकि विपक्ष के वोट बंटने का खतरा बढ़ गया है। इससे NDA को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिल सकता है। राज्यसभा चुनाव आम तौर पर संख्या बल के आधार पर तय होते हैं, लेकिन ऐसे फैसले राजनीतिक संदेश भी देते हैं और भविष्य के गठबंधनों पर असर डालते हैं।
इस घटनाक्रम ने यह भी साफ कर दिया है कि बिहार में विपक्षी एकता अभी पूरी तरह मजबूत नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विपक्ष AIMIM को साथ लाने में सफल होता है या राज्यसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि ओवैसी की इस रणनीति ने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है और राज्यसभा चुनाव को पहले से ज्यादा दिलचस्प बना दिया है।
यह भी पढ़े