Last Updated Jan - 31 - 2026, 04:02 PM | Source : Fela News
नाम जप के नियमों को लेकर उठ रहे सवालों पर प्रेमानंद महाराज ने साधकों को सही दृष्टिकोण और अनुशासन का महत्व समझाया है।
भक्ति और साधना से जुड़े नियमों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में सवाल उठते हैं। इन्हीं सवालों में एक यह भी है कि क्या बिस्तर पर लेटे हुए नाम जप किया जा सकता है। इस विषय पर संत प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रखी है। उनके अनुसार, नाम जप कोई साधारण क्रिया नहीं, बल्कि मन, वाणी और भाव से जुड़ी गहरी साधना है, इसलिए इसे लेकर लापरवाही उचित नहीं मानी जाती।
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि नाम जप का मूल उद्देश्य मन को भगवान के चरणों में स्थिर करना है। यदि व्यक्ति बिस्तर पर लेटकर जप करता है और उसका मन पूरी तरह जाग्रत और एकाग्र है, तो इसे पूर्ण रूप से गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकतर मामलों में बिस्तर पर लेटना आलस्य और निद्रा को बढ़ाता है, जिससे जप की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसीलिए साधकों को यथासंभव बैठकर या एक निश्चित आसन पर नाम जप करने की सलाह दी जाती है।
इस बीच, प्रेमानंद महाराज ने यह भी बताया कि शास्त्रों और परंपराओं में नाम जप के लिए स्वच्छता, अनुशासन और समय का विशेष महत्व बताया गया है। सुबह का समय या संध्या काल को जप के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि उस समय वातावरण और मन दोनों अपेक्षाकृत शांत रहते हैं। उन्होंने कहा कि जप केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि भाव और श्रद्धा का विषय है।
वहीं दूसरी ओर, उन्होंने यह भी कहा कि बीमार व्यक्ति, वृद्ध या ऐसे लोग जो शारीरिक रूप से बैठने में असमर्थ हैं, उनके लिए बिस्तर पर नाम जप करना स्वीकार्य है। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, भगवान भावना देखते हैं, न कि केवल बाहरी नियम। यदि साधक की परिस्थिति विवशता की है और मन सच्चे भाव से जुड़ा है, तो नाम जप का फल अवश्य मिलता है।
सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या नियमों का पालन अधिक महत्वपूर्ण है या भावना का। इस पर प्रेमानंद महाराज ने संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि भावना सर्वोपरि है, लेकिन अनुशासन उस भावना को मजबूत करता है। उन्होंने साधकों को सलाह दी कि वे सुविधा के बजाय साधना को प्राथमिकता दें और नाम जप को एक जिम्मेदारी की तरह अपनाएं।
कुल मिलाकर, प्रेमानंद महाराज का कहना है कि नाम जप कहीं भी किया जा सकता है, लेकिन उसे आदत या आलस्य का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। सही आसन, जाग्रत मन और श्रद्धा के साथ किया गया नाम जप ही साधक को आध्यात्मिक लाभ की ओर ले जाता है।
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