Last Updated Feb - 02 - 2026, 12:07 PM | Source : Fela News
सामना के संपादकीय में सुनेत्रा पवार के सूतक काल में उपमुख्यमंत्री शपथ लेने पर सवाल उठे। इसे परंपराओं के विरुद्ध और राजनीतिक जल्दबाजी बताया गया।
महाराष्ट्र की राजनीति में उस समय नई बहस छिड़ गई जब अजित पवार के निधन के तुरंत बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इस घटनाक्रम पर शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे "बेहद घटिया राजनीति" करार दिया। संपादकीय में खास तौर पर इस बात को उठाया गया कि घर में शोक का वातावरण हो, सूतक काल चल रहा हो, ऐसे समय में शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन हिंदू परंपराओं और सामाजिक संवेदनाओं के खिलाफ माना जाता है।
सामना में लिखा गया कि अजित पवार के निधन से महाराष्ट्र अभी उबर भी नहीं पाया था कि राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं। संपादकीय के अनुसार, यह फैसला इतनी जल्दी और गोपनीय तरीके से लिया गया कि परिवार के कई सदस्यों को भी इसकी भनक नहीं लगी। शरद पवार और सुप्रिया सुले की प्रतिक्रियाओं का हवाला देते हुए यह संकेत दिया गया कि इस शपथ ग्रहण की जानकारी उन्हें पहले से नहीं थी ।
संपादकीय में यह भी कहा गया कि सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाया जाना किसी राजनीतिक अनुभव या कर्तृत्व के आधार पर नहीं, बल्कि पार्टी में संभावित अस्थिरता को रोकने के लिए किया गया कदम है। अजित पवार के निधन के बाद उनके गुट में नेतृत्व को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती थी। ऐसे में जल्दबाजी में निर्णय लेकर सुनेत्रा पवार को आगे लाया गया, ताकि विधायकों और पदाधिकारियों को एकजुट रखा जा सके।
लेख में भाजपा की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। सामना ने इसे भाजपा नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति बताया और संकेत दिया कि इस फैसले के पीछे सत्ता संतुलन बनाए रखने की कोशिश है। संपादकीय में यह भी लिखा गया कि अजित पवार के बाद पार्टी में कई नेताओं की महत्वाकांक्षाएं उभरकर सामने आ सकती थीं, जिससे अंदरूनी खींचतान बढ़ती । इस आशंका को देखते हुए सुनेत्रा पवार को आगे कर दिया गया।
संपादकीय में 'सूतक' शब्द का उल्लेख करते हुए यह तर्क दिया गया कि शोक काल में इस तरह का सार्वजनिक शपथ समारोह करना परंपरागत मान्यताओं के विपरीत है। सामना ने लिखा कि यदि गठबंधन खुद को सनातन विचारधारा से जोड़कर देखता है, तो उसे ऐसी संवेदनशील स्थितियों में सामाजिक परंपराओं का भी ध्यान रखना चाहिए।
लेख में यह भी कहा गया कि अजित पवार के निधन के बाद पार्टी की स्थिति उस नाव जैसी हो गई है, जिसका कप्तान चला गया हो। हर कोई अपनी दिशा में नाव मोड़ने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में सुनेत्रा पवार का नेतृत्व पार्टी को स्थिरता दे पाएगा या नहीं, यह समय ही बताएगा। संपादकीय में संकेत दिया गया कि असली नियंत्रण कहीं और है और राजनीतिक डोरें दूसरे हाथों में हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ राज्य को पहली महिला उपमुख्यमंत्री मिलने की बात कही जा रही है, तो दूसरी तरफ इस फैसले के समय और तरीके पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सूतक, परंपरा, राजनीति और सत्ता संतुलन के बीच यह मामला अब राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है।
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