Last Updated Feb - 06 - 2026, 03:55 PM | Source : Fela News
बिहार का मुंगेर जिला, जो कभी अवैध हथियारों के लिए कुख्यात था, अब ब्राउन शुगर और स्मैक की तस्करी का नया हब बनता जा रहा है, जहां किशोर भी कुरियर बन रहे हैं।
ऐतिहासिक विरासत और योग नगरी के रूप में पहचान रखने वाला बिहार का मुंगेर जिला एक बार फिर अपराध की काली परछाईं में घिरता नजर आ रहा है। कभी देशभर में अवैध हथियार निर्माण और तस्करी के लिए कुख्यात रहा यह जिला अब नशीले पदार्थों के कारोबार का नया ठिकाना बनता जा रहा है। हथियारों की मंडी में अब 'सफेद जहर' यानी ब्राउन शुगर, स्मैक और प्रतिबंधित दवाओं की घुसपैठ ने कानून-व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक ताने-बाने को भी गहरे संकट में डाल दिया है।
वर्ष 2025-26 के पुलिस आंकड़े बताते हैं कि सख्ती बढ़ने के बावजूद तस्करों ने अपने तरीके बदल लिए हैं। हथियार तस्करी के लिए इस्तेमाल होने वाले पुराने रूट अब ड्रग पेडलिंग के काम आ रहे हैं। पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अपराध का नेटवर्क और ज्यादा फैलता जा रहा है। खासकर दुर्गम दियारा इलाके आज भी पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं, जहां अपराधी आसानी से ठिकाने बदल लेते हैं।
शहर के कासिम बाजार और कोतवाली थाना क्षेत्र के कुछ हिस्से अब स्थानीय लोगों की जुबान पर 'नशा जोन' के नाम से पहचाने जाने लगे हैं। महिलाओं का आरोप है कि शाम ढलते ही खंडहरों, सुनसान पार्कों और गंगा किनारे बनी झोपड़ियों में खुलेआम स्मैक और नशे के इंजेक्शन लिए जाते हैं। कई बार विरोध करने पर स्थानीय लोगों को धमकियां भी मिलती हैं, जिससे डर का माहौल बन गया है।
पुलिस ने हाल के महीनों में ऐसे कई गिरोहों को पकड़ा है, जो अवैध पिस्तौल की डिलीवरी के साथ-साथ नशीले पाउडर की छोटी-छोटी खेप भी सप्लाई कर रहे थे। सूत्रों की मानें तो अब हथियार के बदले ड्रग्स का लेन-देन भी होने लगा है। पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों से जुड़े नेटवर्क के कारण मुंगेर ब्राउन शुगर और प्रतिबंधित दवाओं की तस्करी का उभरता केंद्र बनता जा रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस अवैध कारोबार में अब कम उम्र के किशोरों को शामिल किया जा रहा है। इन्हें 'कूरियर' के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, ताकि शक कम हो। चंद पैसों या नशे की लत के बदले ये किशोर पिस्तौल और ड्रग्स की डिलीवरी करते हैं। कई मामलों में तो मजदूरी के रूप में पैसे नहीं, बल्कि नशीले पदार्थ ही दिए जा रहे हैं, जिससे उनका भविष्य अंधकार में धकेला जा रहा है।
स्थानीय व्यवसायियों और अभिभावकों की चिंता अब और गहरी हो गई है। एक प्रतिष्ठित व्यापारी का कहना है कि पहले डर रंगदारी का था, अब डर इस बात का है कि कहीं हमारा बच्चा नशे की गिरफ्त में न आ जाए। हर गली-मोहल्ले में संदिग्ध युवकों की मौजूदगी लोगों को असुरक्षित महसूस करा रही है। आरोप है कि पुलिस की गश्त मुख्य सड़कों तक सीमित रहती है, जबकि अंदरूनी इलाकों में अपराधी बेखौफ घूमते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि मुंगेर की इस समस्या का समाधान केवल छापेमारी और गिरफ्तारी से संभव नहीं है। जब तक युवाओं को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और नशा मुक्ति के ठोस विकल्प नहीं मिलेंगे, तब तक अपराध की जड़ें कमजोर नहीं होंगी। हथियारों की गूंज को कारखानों के शोर में बदलना और नशे की सप्लाई चेन तोड़ना ही अब इस ऐतिहासिक जिले को फिर से सुरक्षित और सम्मानजनक पहचान दिला सकता
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