Last Updated Feb - 14 - 2026, 12:57 PM | Source : Fela News
8,000 मीटर से ऊपर का क्षेत्र डेथ जोन कहलाता है, जहां ऑक्सीजन बेहद कम होती है। यहां इंसान का शरीर धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगता है।
दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटियों पर पहुंचना रोमांच, साहस और जीत का प्रतीक माना जाता है। बर्फ से ढकी चोटियां, बादलों के ऊपर खड़े होने का अनुभव और शिखर पर पहुंचने का गर्व हर पर्वतारोही का सपना होता है। लेकिन इसी रोमांच के बीच एक ऐसा खतरनाक क्षेत्र भी आता है, जिसे 'डेथ जोन' कहा जाता है। यह वह ऊंचाई है, जहां इंसान का शरीर धीरे-धीरे हार मानने लगता है और सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है।
डेथ जोन आमतौर पर समुद्र तल से 8,000 मीटर (लगभग 26,247 फीट) से ऊपर के क्षेत्र को कहा जाता है। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट, जिसकी ऊंचाई 8,848.86 मीटर है, उसका ऊपरी हिस्सा इसी डेथ जोन में आता है। इस ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन का स्तर सामान्य की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाता है। इसका मतलब है कि शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिससे शरीर के जरूरी अंगों का काम प्रभावित होने लगता है।
डेथ जोन में सबसे बड़ा खतरा हाइपोक्सिया होता है, यानी शरीर और दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन का न पहुंचना। जब दिमाग को ऑक्सीजन कम मिलती है, तो व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। पर्वतारोहियों को चक्कर आना, भ्रम होना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और गलत निर्णय लेने जैसी समस्याएं होने लगती हैं। कई बार व्यक्ति को यह एहसास भी नहीं होता कि उसकी स्थिति गंभीर हो चुकी है।
इस ऊंचाई पर हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडेमा (HACE) का खतरा भी बढ़ जाता है। यह एक गंभीर स्थिति है, जिसमें दिमाग में सूजन आ जाती है। इसके लक्षणों में तेज सिरदर्द, उल्टी, संतुलन खोना, व्यवहार में बदलाव और बेहोशी शामिल हैं। अगर समय रहते व्यक्ति को नीचे नहीं लाया जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है।
इसके अलावा हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडेमा (HAPE) भी एक बड़ा खतरा है। इसमें फेफड़ों में तरल भरने लगता है, जिससे सांस लेना बेहद कठिन हो जाता है। व्यक्ति को सीने में जकड़न, तेज खांसी और दम घुटने जैसा महसूस होता है। यह स्थिति भी तुरंत इलाज न मिलने पर जान के लिए खतरा बन सकती है।
डेथ जोन में शरीर की ऊर्जा भी तेजी से खत्म होती है। इतनी ऊंचाई पर हर कदम उठाना बेहद मुश्किल हो जाता है। शरीर कमजोर पड़ने लगता है और मांसपेशियां ठीक से काम नहीं कर पातीं। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्वतारोहियों के लिए चोटी पर पहुंचना जितना मुश्किल होता है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक वहां से सुरक्षित वापस लौटना होता है। थकान, ऑक्सीजन की कमी और खराब मौसम कई बार हादसों का कारण बनते हैं।
इसी वजह से पर्वतारोही डेथ जोन में ज्यादा समय नहीं बिताते। वे अतिरिक्त ऑक्सीजन सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं और तेजी से चढ़ाई पूरी कर नीचे लौटने की कोशिश करते हैं। यह क्षेत्र इंसान के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति की कठोर सीमाओं का प्रतीक है।
डेथ जोन हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के सामने इंसान कितना छोटा और कमजोर है। यहां पहुंचना साहस की मिसाल जरूर है, लेकिन यहां टिके रहना जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
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