Last Updated Nov - 15 - 2025, 12:25 PM | Source : Fela News
बिहार चुनाव में महागठबंधन को मिली करारी हार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। तेजस्वी यादव का चेहरा, कांग्रेस का कैंपेन और गठबंधन की पूरी रणनीति—कहां क्या चूका, अब यह
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि महागठबंधन की तैयारियां जमीन पर असर नहीं दिखा सकीं। RJD ने तेजस्वी यादव को मजबूत ‘सीएम फेस’ के तौर पर पेश किया था, लेकिन इस बार उनका अभियान उछाल नहीं पकड़ पाया। तेजस्वी की रैलियां भीड़ तो खींचती रहीं, पर वोटों में वह भावनात्मक जुड़ाव दिखाई नहीं दिया, जिसकी उम्मीद जताई जा रही थी।
उधर, कांग्रेस के ‘स्टार कैंपेन’ और राहुल गांधी की मौजूदगी भी वोटरों को खास आकर्षित नहीं कर सकी। कई सीटों पर कांग्रेस कमजोर कड़ी साबित हुई, जिसका सीधा नुकसान महागठबंधन को हुआ। पार्टी का संगठन कमजोर रहा और स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों के चयन को लेकर भी सवाल उठे।
समस्या सिर्फ चेहरों की नहीं रही, रणनीति भी बिखरी हुई दिखी। महागठबंधन ने बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे उठाए, लेकिन इनकी प्रस्तुति में मजबूती नहीं थी। दूसरी ओर, NDA ने अपने विकास मॉडल, सामाजिक समीकरण और मजबूत जमीनी नेटवर्क का फायदा उठाया। JDU और BJP ने बूथ स्तर पर बेहतर तैयारी की, जिसका असर परिणामों में साफ दिखा।
महागठबंधन का एक बड़ा संकट यह भी था कि विभिन्न दलों के बीच तालमेल पूरी तरह बन नहीं पाया। RJD और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे पर पहले से ही खींचतान रही, और चुनाव के दौरान भी दोनों पार्टियों की गति एक जैसी नहीं दिखी। कई क्षेत्रों में वोटों का ट्रांसफर सही ढंग से नहीं हो पाया, जिससे NDA को अप्रत्याशित बढ़त मिल गई।
तेजस्वी यादव की ‘परिवर्तन’ की अपील प्रभावी थी, लेकिन यह उन इलाकों में कमज़ोर पड़ गई जहां NDA की पकड़ सामाजिक स्तर पर काफी मजबूत थी। इसके अलावा, महागठबंधन यह आकलन करने में चूक गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिहार सरकार की योजनाओं का असर उनके मुद्दों से ज़्यादा भारी साबित होगा।
कुल मिलाकर, यह चुनाव दिखाता है कि सिर्फ नारों, चेहरों और बड़े वादों से जीत नहीं मिलती। मजबूत संगठन, स्पष्ट रणनीति और एकजुट चेहरा—ये तीनों ही महागठबंधन में इस बार गायब रहे। परिणाम यह हुआ कि पूरा शो कमजोर पड़ गया और NDA फिर से बाजी ले गया।
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