Last Updated Feb - 19 - 2026, 02:59 PM | Source : Fela news
छत्रपति शिवाजी महाराज का संघर्ष केवल मुगलों से नहीं था. आदिलशाही, सिद्दी, यूरोपीय शक्तियां और आंतरिक विरोधी भी उनके प्रमुख दुश्मन थे. जानिए स्वराज्य की लड़ाई का पूरा इतिहास.
छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के उन महान योद्धाओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद एक शक्तिशाली और स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की स्थापना की. आमतौर पर यह माना जाता है कि उनका संघर्ष केवल मुगल साम्राज्य से था, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि उनके सामने कई शक्तिशाली दुश्मन थे. इन संघर्षों का कारण व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, बल्कि सत्ता, सामरिक नियंत्रण और स्वराज्य की स्थापना का लक्ष्य था.
17वीं शताब्दी में जब शिवाजी महाराज का उदय हुआ, उस समय दक्कन क्षेत्र में कई शक्तिशाली सल्तनतें मौजूद थीं. बीजापुर की आदिलशाही उनके सबसे बड़े शुरुआती विरोधियों में से एक थी. शिवाजी के पिता शाहजी भोसले आदिलशाही की सेवा में थे, लेकिन शिवाजी ने स्वतंत्र मराठा सत्ता की स्थापना का मार्ग चुना.
जैसे-जैसे शिवाजी ने किलों और क्षेत्रों पर कब्जा करना शुरू किया, आदिलशाही ने उन्हें रोकने के लिए कई सैन्य अभियान चलाए. अफजल खान को शिवाजी को खत्म करने के लिए भेजा गया, लेकिन 1659 में प्रतापगढ़ में शिवाजी ने रणनीति से उसे परास्त कर दिया.
मुगल साम्राज्य भी शिवाजी का प्रमुख विरोधी बना. औरंगजेब दक्कन पर अपना पूर्ण नियंत्रण चाहता था, जबकि शिवाजी स्वतंत्र मराठा राज्य स्थापित करना चाहते थे. मुगलों ने शिवाजी के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाए. 1663 में शिवाजी ने पुणे में मुगल सूबेदार शाइस्ता खान पर अचानक हमला कर मुगलों को चौंका दिया. 1666 में आगरा में शिवाजी को नजरबंद किया गया, लेकिन उन्होंने साहसिक तरीके से वहां से भागकर अपनी स्वतंत्रता और शक्ति को बनाए रखा.
इसके अलावा कोंकण तट पर जंजीरा के सिद्दी भी शिवाजी के महत्वपूर्ण दुश्मन थे. सिद्दी समुद्री शक्ति के लिए जाने जाते थे और मुगलों तथा आदिलशाही से जुड़े हुए थे. शिवाजी ने समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अपनी नौसेना विकसित की और सिंधुदुर्ग तथा विजयदुर्ग जैसे किलों का निर्माण कराया. हालांकि जंजीरा का किला अभेद्य रहा, लेकिन शिवाजी ने सिद्दियों को लगातार चुनौती दी.
यूरोपीय शक्तियां, विशेष रूप से पुर्तगाली और अंग्रेज, भी उस समय भारत में व्यापारिक और सामरिक रूप से सक्रिय थे. शिवाजी का उनसे संबंध कभी सहयोगात्मक तो कभी संघर्षपूर्ण रहा. उन्होंने 1664 और 1670 में सूरत पर आक्रमण कर मुगल आर्थिक शक्ति को चुनौती दी और अपने संसाधनों को मजबूत किया.
शिवाजी को केवल बाहरी दुश्मनों का ही सामना नहीं करना पड़ा, बल्कि कुछ मराठा सरदार भी उनके विरोध में थे. कई स्थानीय शासक अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखना चाहते थे और शिवाजी के केंद्रीकृत शासन का विरोध करते थे. इसके बावजूद शिवाजी ने अपनी सैन्य रणनीति, प्रशासनिक कुशलता और जनसमर्थन के बल पर सभी चुनौतियों का सामना किया.
1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ, जिसने मराठा साम्राज्य को आधिकारिक पहचान दी. यह केवल एक समारोह नहीं था, बल्कि स्वतंत्र और सार्वभौम शासन की घोषणा थी. शिवाजी महाराज की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने समय की सबसे शक्तिशाली ताकतों का डटकर सामना किया और स्वराज्य का सपना साकार किया. छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन इस बात का प्रमाण है कि मजबूत नेतृत्व, रणनीति और संकल्प के बल पर बड़े से बड़े साम्राज्य को चुनौती दी जा सकती है. उनका संघर्ष केवल युद्ध नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्र निर्माण की एक महान गाथा थी.
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