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Maharishi Valmiki Jayanti 2025: डाकू से महर्षि तक, राम नाम ने कैसे बदली किस्मत

Maharishi Valmiki Jayanti 2025: डाकू से महर्षि तक, राम नाम ने कैसे बदली किस्मत

Last Updated Oct - 07 - 2025, 11:21 AM | Source : Fela news

Maharishi Valmiki Jayanti 2025: हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का शुरुआती जीवन रत्नाकर नाम के डाकू के रूप में बीता. लेकिन राम का उल
डाकू से महर्षि तक
डाकू से महर्षि तक

Maharishi Valmiki Jayanti 2024: महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत में रामायण की रचना की, जिसे आज वाल्मीकि रामायण कहा जाता है। वे संस्कृत भाषा के पहले कवि भी माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, उनका जन्म आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ था। इसलिए हर साल इस दिन वाल्मीकि जयंती मनाई जाती है। इस मौके पर मंदिरों में भजन-कीर्तन, शोभायात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

हिंदू धर्म में आश्विन पूर्णिमा का दिन बहुत शुभ माना जाता है, क्योंकि इसी दिन रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का जन्म हुआ था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे पहले एक डाकू रत्नाकर हुआ करते थे? आइए जानते हैं कि कैसे वे राम भक्त बनकर महर्षि वाल्मीकि बने।

डाकू रत्नाकर कैसे बने महर्षि वाल्मीकि

कथाओं के अनुसार, वाल्मीकि का असली नाम रत्नाकर था। उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ, लेकिन बचपन में उनका अपहरण एक भीलनी ने कर लिया और उसी ने उन्हें पाला। बड़े होकर रत्नाकर ने भी अपने पालक परिवार की तरह लोगों को लूटना शुरू कर दिया।

एक दिन उन्होंने नारद मुनि को लूटने की कोशिश की। नारद मुनि ने उनसे पूछा कि तुम यह पाप क्यों कर रहे हो? रत्नाकर ने कहा कि परिवार का पेट पालने के लिए। तब नारद मुनि ने पूछा — “क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारे इन पापों में तुम्हारे साथ हिस्सा बांटेगा?”

रत्नाकर ने जाकर अपने परिवार से पूछा, लेकिन किसी ने भी उसके पाप में भागीदार बनने से इनकार कर दिया। तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह वापस गया, नारद मुनि से माफी मांगी, और उनसे सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना की।

‘मरा-मरा’ से ‘राम-राम’ तक का सफर

नारद मुनि ने उसे राम का नाम जपने को कहा, लेकिन रत्नाकर “राम” नहीं बोल पा रहे थे। उन्होंने “मरा-मरा” जपना शुरू किया, और धीरे-धीरे वही “राम-राम” बन गया। वह सालों तक तपस्या में लीन रहे, यहाँ तक कि उनके शरीर पर दीमकों ने बांबी बना ली।

क्यों कहलाए वाल्मीकि

तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने रत्नाकर को दर्शन दिए और उन्हें नया नाम दिया — वाल्मीकि, क्योंकि ‘वाल्मीकि’ का अर्थ होता है ‘दीमकों का घर’। ब्रह्माजी ने उन्हें रामायण लिखने की प्रेरणा भी दी।

 

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