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ब्रिक्स में कॉमन करेंसी नहीं, डॉलर पर साफ रुख स्पष्ट

ब्रिक्स में कॉमन करेंसी नहीं, डॉलर पर साफ रुख स्पष्ट

Last Updated Feb - 12 - 2026, 03:36 PM | Source : Fela News

ब्रिक्स देशों ने साफ किया है कि कॉमन करेंसी बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। राष्ट्रीय मुद्राओं के उपयोग पर जोर देते हुए डॉलर को कमजोर करने की मंशा से इनकार किया
ब्रिक्स में कॉमन करेंसी नहीं
ब्रिक्स में कॉमन करेंसी नहीं

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक हलकों में चल रही अटकलों पर अब विराम लगता दिख रहा है। अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने के कथित प्रयासों को लेकर उठी चर्चाओं के बीच रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि ब्रिक्स देशों के एजेंडे में कोई साझा या कॉमन करेंसी शामिल नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत कई पश्चिमी विश्लेषक आशंका जता रहे थे कि ब्रिक्स समूह यूरोपीय यूनियन की तरह अपनी अलग मुद्रा की दिशा में बढ़ सकता है। 

रूस के शेरपा और उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने साफ कहा कि ब्रिक्स किसी एकीकृत मुद्रा की स्थापना पर विचार नहीं कर रहा। उनका कहना था कि समूह का फोकस सदस्य देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में लेनदेन को बढ़ावा देने पर है, न कि अमेरिकी डॉलर को कमजोर करने पर उन्होंने यह भी दोहराया कि यह कदम किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन का हिस्सा नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक लेनदेन को अधिक संतुलित और लचीला बनाने का प्रयास है। 

ब्रिक्स की मौजूदा अध्यक्षता भारत के पास है और हाल ही में नई दिल्ली में शेरपाओं की बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने आर्थिक सहयोग, व्यापार और निवेश के मुद्दों पर चर्चा की। भारत ने अपने नेतृत्व में समूह की प्राथमिकताओं को संतुलित और व्यवहारिक रखने पर जोर दिया है। 

दरअसल, जुलाई 2025 में रियो डी जनेरियो में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में एक 'ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स' के गठन पर सहमति बनी थी। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सीमा पार भुगतान प्रणाली को सरल बनाना और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना है। हालांकि, इसे नई साझा मुद्रा के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि भुगतान प्रणाली में विविधता लाने की पहल माना जा रहा है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद मॉस्को वैकल्पिक वित्तीय ढांचे की खोज में है। ऐसे में राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना उसके लिए रणनीतिक रूप से अहम हो सकता है। वहीं चीन भी लंबे समय से युआन के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में प्रयासरत है। 

ब्रिक्स समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका संस्थापक सदस्य हैं। हाल के वर्षों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, मिस्र और इथियोपिया जैसे देश भी पूर्ण सदस्य के रूप में जुड़े हैं। इससे समूह का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है। 

हालांकि डॉलर अभी भी वैश्विक व्यापार और रिजर्व करेंसी के रूप में प्रमुख है, लेकिन बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ते कदमों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। फिलहाल रूस के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ब्रिक्स की रणनीति साझा मुद्रा नहीं, बल्कि वित्तीय सहयोग के वैकल्पिक मॉडल पर आधारित है। 

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह पहल वैश्विक आर्थिक समीकरणों को किस हद तक प्रभावित करती है। 

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