Last Updated Jan - 08 - 2026, 05:38 PM | Source : Fela News
ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नजर तेज, सैन्य ताकत होते हुए भी सीधा कब्जा नहीं, कूटनीति और रणनीति से बढ़ाई जा रही पकड़।
दुनिया के नक्शे पर बर्फ से ढका ग्रीनलैंड अचानक बड़ी ताकतों की रणनीति का केंद्र बनता जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा कर सकता है या नहीं, सवाल यह है कि जब सैन्य ताकत मौजूद है तो वॉशिंगटन सीधे कदम उठाने के बजाय कूटनीतिक चालें क्यों चल रहा है।
ग्रीनलैंड तकनीकी रूप से डेनमार्क का हिस्सा है, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति इसे अमेरिका के लिए बेहद अहम बनाती है। आर्कटिक क्षेत्र में मौजूद यह द्वीप रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन का केंद्र माना जाता है। यहां से मिसाइल डिफेंस सिस्टम, रडार निगरानी और समुद्री रास्तों पर नजर रखना आसान हो जाता है। अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी रखता है और वहां उसका एयरबेस भी है।
डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड को खरीदने की बात ने दुनिया को चौंका दिया था। उस वक्त इसे मजाक समझा गया, लेकिन रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की गहरी योजना का संकेत था। ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल और गैस के बड़े भंडार माने जाते हैं, जो भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं। चीन और रूस की बढ़ती दिलचस्पी ने अमेरिका की चिंता और बढ़ा दी है।
सैन्य रूप से देखें तो अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड पर कब्जा करना मुश्किल नहीं माना जाता। उसकी सैन्य ताकत, तकनीक और क्षेत्र में मौजूद ढांचा उसे बढ़त देता है। फिर भी अमेरिका सीधा कदम नहीं उठा रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह कूटनीतिक नुकसान है। किसी संप्रभु क्षेत्र पर बलपूर्वक कब्जा करना अमेरिका की वैश्विक छवि को भारी नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर तब जब वह खुद को लोकतंत्र और नियम आधारित व्यवस्था का समर्थक बताता रहा है।
इसके अलावा डेनमार्क अमेरिका का सहयोगी देश है और नाटो का हिस्सा भी। ऐसे में सैन्य कार्रवाई नाटो के भीतर गंभीर संकट पैदा कर सकती है। यही वजह है कि अमेरिका दबाव, समझौते और रणनीतिक साझेदारी के जरिए धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। निवेश, सुरक्षा सहयोग और राजनीतिक समर्थन इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं। यह बदलाव ग्रीनलैंड की अहमियत को और बढ़ा रहा है। अमेरिका जानता है कि भविष्य की जंग सिर्फ जमीन या हथियारों की नहीं, बल्कि संसाधनों और रास्तों की होगी। इसलिए वह जल्दबाजी के बजाय सही मौके का इंतजार कर रहा है।
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की चुप्पी कमजोरी नहीं, बल्कि लंबी चाल का संकेत मानी जा रही है। जब समय और हालात अनुकूल होंगे, तब यह रणनीति किस रूप में सामने आएगी, यही आने वाले सालों का सबसे बड़ा सवाल है।