Last Updated Feb - 07 - 2026, 11:50 AM | Source : Fela News
भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील फ्रेमवर्क पर सहमति बनी है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि यह समझौता टैरिफ, सप्लाई चेन और निवेश के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत के हाथ में अमेरिकी बाजार की 'चाबी'! पीयूष गोयल ने समझाए ट्रेड डील के वो पॉइंट्स, जो बदल देंगे देश की इकोनॉमीभारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Deal Framework) पर बनी सहमति को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था United States और दुनिया के सबसे बड़े उभरते बाजार India के बीच यह समझौता ऐसे समय आया है, जब वैश्विक सप्लाई चेन में बड़े बदलाव हो रहे हैं और देश चीन पर निर्भरता कम करने के विकल्प तलाश रहे हैं।
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने इस डील को भारत के लिए रणनीतिक जीत बताया है। उनके अनुसार, यह फ्रेमवर्क केवल टैरिफ घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा, तकनीक, निवेश और सप्लाई चेन सुरक्षा जैसे अहम क्षेत्रों में दोनों देशों को और करीब लाने वाला है। यही वजह है कि इसे 'फादर ऑफ ऑल डील' तक कहा जा रहा है।
इस समझौते के तहत भारत ने अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं पर टैरिफ खत्म करने या कम करने पर सहमति दी है। इसके साथ ही अमेरिका से आने वाले कृषि और खाद्य उत्पादों - जैसे पशु आहार, मेवे, फल, सोयाबीन तेल, शराब और स्पिरिट – पर भी शुल्क में कटौती होगी। इससे भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद मिलने की उम्मीद है।
वहीं अमेरिका ने भी भारतीय निर्यातकों के लिए रास्ते खोलने का संकेत दिया है। फिलहाल वस्त्र, परिधान, चमड़ा, जूते, प्लास्टिक, रबर, जैविक रसायन और हस्तशिल्प जैसे उत्पादों पर 18 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया जाएगा, लेकिन अंतरिम समझौते के सफल क्रियान्वयन के बाद जेनेरिक फार्मास्यूटिकल्स, रत्न- हीरे और विमान पुर्जों जैसे क्षेत्रों में यह शुल्क हटाया जा सकता है। इससे भारत के श्रम-प्रधान सेक्टर को बड़ा फायदा मिलने की संभावना है।
इस फ्रेमवर्क में स्टील, एल्युमीनियम और ऑटो पार्ट्स जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत लगाए गए कुछ शुल्कों को हटाने या नरम करने पर सहमति बनी है। भारत को ऑटो पार्ट्स के लिए तरजीही शुल्क कोटा मिलने की बात भी कही गई है, जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिल सकता है।
डील का एक अहम पहलू नॉन-टैरिफ बाधाओं को कम करना भी है। दोनों देश चिकित्सा उपकरण, आईसीटी उत्पाद और कृषि वस्तुओं से जुड़े मानकों और परीक्षण प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर काम करेंगे। छह महीने के भीतर अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने की दिशा में बातचीत आगे बढ़ेगी, जिससे व्यापार में आने वाली तकनीकी रुकावटें कम होंगी।
डिजिटल ट्रेड और सप्लाई चेन सुरक्षा भी इस समझौते का अहम हिस्सा हैं। दोनों देशों ने डिजिटल व्यापार को आसान बनाने और भविष्य में पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) के तहत स्पष्ट नियम तय करने का संकल्प लिया है। इसके साथ ही निवेश समीक्षा, निर्यात नियंत्रण और तीसरे देशों की नॉन-मार्केट नीतियों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है।
सबसे बड़ा संकेत भारत का परचेज कमिटमेंट है। भारत ने अगले पांच वर्षों में करीब 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने का वादा किया है, जिसमें ऊर्जा, विमान और उनके पुर्जे, तकनीकी उपकरण और कोकिंग कोयला शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी नई ऊंचाई पर पहुंच सकती है।
कुल मिलाकर, यह अंतरिम ट्रेड डील सिर्फ एक समझौता नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति का अहम हिस्सा बन सकती है। अगर यह फ्रेमवर्क तय लक्ष्यों पर खरा उतरता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिलने के साथ-साथ अमेरिका के विशाल बाजार में भारत की पकड़ भी मजबूत हो सकती है।
यह भी पढ़े