Last Updated Feb - 06 - 2026, 03:18 PM | Source : Fela News
ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता से पहले विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ किया कि तेहरान दबाव में नहीं झुकेगा। बातचीत सिद्धांतों, सम्मान और आपसी हितों के आधार पर ही
ईरान और अमेरिका के बीच एक बार फिर परमाणु मुद्दे पर आमने-सामने की बातचीत शुरू होने जा रही है, लेकिन इससे पहले ही तेहरान ने अपने तेवर साफ कर दिए हैं। ओमान की राजधानी Muscat में होने वाली नई परमाणु वार्ता से कुछ घंटे पहले ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने बड़ा बयान देकर संकेत दिया है कि यह बातचीत आसान नहीं होने वाली । सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए अराघची ने कहा कि ईरान "खुली आंखों के साथ” और बीते एक साल के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए वार्ता में शामिल हो रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ईरान सिद्धांतों पर आधारित कूटनीति के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अपने अधिकारों से किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेगा। उनका यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब पश्चिम एशिया पहले से ही तनाव के दौर से गुजर रहा है।
अराघची ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान किसी भी समझौते को सिर्फ कागजी वादों तक सीमित नहीं देखना चाहता। उनके अनुसार, बराबरी का दर्जा, आपसी सम्मान और आपसी हित कोई औपचारिक शब्द नहीं हैं, बल्कि किसी भी टिकाऊ परमाणु समझौते की बुनियाद हैं। ईरान का रुख साफ है कि अगर प्रतिबंधों में वास्तविक राहत नहीं मिली और वादों को जमीन पर लागू नहीं किया गया, तो समझौते का कोई मतलब नहीं होगा।
पिछले कुछ महीनों में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव काफी बढ़ गया है। जून 2025 में Israel और ईरान के बीच 12 दिन तक चले संघर्ष ने हालात और बिगाड़ दिए। इसके बाद अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के कुछ प्रमुख परमाणु ठिकानों पर की गई बमबारी ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया। इसी दौरान ईरान के भीतर विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की सख्ती और हिंसक कार्रवाई भी अंतरराष्ट्रीय आलोचना का विषय बनी।
ईरान की मांग है कि बातचीत केवल परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे प्रतिबंधों तक ही सीमित रहे। दूसरी ओर, अमेरिका चाहता है कि इस वार्ता में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को भी शामिल किया बिंदु दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा टकराव बनकर उभर रहा है।
अमेरिका ने इस बीच पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी भी बढ़ा दी है, जिससे ईरान की आशंकाएं और गहरी हो गई हैं। हालांकि कई दौर की परोक्ष बातचीत के बाद अब आमने-सामने की वार्ता को तनाव कम करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बातचीत पर करीबी नजर बनाए हुए है, क्योंकि इसका असर सिर्फ ईरान-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की कोशिशों पर भी पड़ेगा।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी थी कि यह ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के लिए "अच्छा समय नहीं” है। ऐसे बयानों से साफ है कि कूटनीति और दबाव की राजनीति एक साथ चल रही है।
अब सबकी निगाहें मस्कट में शुरू होने वाली इस वार्ता पर टिकी हैं। सवाल यही है कि क्या दोनों देश टकराव के रास्ते से हटकर समझौते की ओर बढ़ेंगे, या फिर परमाणु डील पर एक नई जंग की आहट सुनाई देगी।
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