Last Updated Nov - 29 - 2025, 04:32 PM | Source : Fela News
पाकिस्तान में हुए ताज़ा संवैधानिक संशोधन ने हालात और उलझा दिए हैं। अदालतों की स्वतंत्रता से लेकर सैन्य जवाबदेही तक, सब पर सवाल उठने लगे हैं। इसी वजह से संयुक्त
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने हाल ही में ऐसा संशोधन पारित किया है, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की शक्तियों के सीमित होने की आशंका बढ़ गई है। आलोचकों का कहना है कि ये संशोधन ऐसे समय में लाया गया है जब सरकार सैन्य प्रतिष्ठान और सत्ता तंत्र को कानूनी सुरक्षा देने में लगी दिख रही है। इससे यह डर पैदा हो रहा है कि न्यायपालिका अब स्वतंत्र फैसले लेने में पहले जितनी मजबूत नहीं रह जाएगी।
UN मानवाधिकार कार्यालय ने बयान जारी करते हुए कहा कि पाकिस्तान को ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करे। उनका मानना है कि इस संशोधन से देश में पहले से मौजूद राजनीतिक खींचतान और अस्थिरता और गंभीर हो सकती है। कई विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि यह बदलाव संविधान की उस मूल भावना के खिलाफ है जिसमें न्यायपालिका को सत्ता के दुरुपयोग पर रोक लगाने की जिम्मेदारी दी गई है।
संशोधन के बाद सेना से जुड़े मामलों, भ्रष्टाचार जांच और राजनीतिक हस्तक्षेप से जुड़े फैसलों पर अदालतों की भूमिका सीमित होने का खतरा है। विपक्ष का आरोप है कि ये कदम असल में सत्ता पक्ष के लिए एक सुरक्षा कवच तैयार करने की कोशिश है, ताकि बड़े पदों पर बैठे लोगों को कानूनी जांच का सामना न करना पड़े। वहीं सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कह रही है कि बदलाव सिर्फ “प्रणाली को सुचारू” बनाने के लिए किए जा रहे हैं।
पाकिस्तान की न्यायिक बिरादरी में भी इस संशोधन को लेकर असंतोष बढ़ने लगा है। कई पूर्व जजों और कानूनी विशेषज्ञों ने इसे लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा प्रहार बताया है। उनका कहना है कि अगर अदालतें कमजोर होंगी तो निष्पक्ष न्याय का सवाल ही खत्म हो जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठी चिंताओं के बाद अब पाकिस्तान सरकार पर दबाव बढ़ गया है कि वह संशोधन के प्रभावों की समीक्षा करे और न्यायिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के ठोस कदम उठाए। हालांकि देश के अंदर राजनीतिक संघर्ष बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है, क्योंकि विपक्ष इसे बड़े विरोध का मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
ये पूरा मामला पाकिस्तान की उस पुरानी समस्या को एक बार फिर सामने लाता है—जहां सत्ता, सेना और न्यायपालिका के बीच संतुलन हमेशा तनाव में रहा है। नया संशोधन इस तनाव को और बढ़ा सकता है, और इसी वजह से इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
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