Last Updated Jan - 16 - 2026, 05:43 PM | Source : Fela News
रूस का परमाणु अंडरवॉटर ड्रोन पोसीडन पूरी दुनिया के लिए नई चुनौती बन गया है, जो रेडियोधर्मी सुनामी से तटीय शहरों को तबाह कर सकता है।
दुनिया की सैन्य ताकतों के बीच चल रही हथियारों की दौड़ में रूस ने एक ऐसा खतरनाक अध्याय जोड़ दिया है, जिसने वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। इस हथियार का नाम है पोसीडन न्यूक्लियर अंडरवॉटर ड्रोन, जिसे सैन्य विशेषज्ञ "समंदर का राक्षस" और "डूम्सडे ड्रोन" तक कह रहे हैं। यह हथियार पारंपरिक मिसाइल सिस्टम से बिल्कुल अलग है और समुद्र की गहराइयों से तबाही मचाने की क्षमता रखता है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार इस हथियार का जिक्र करते हुए इसे रूस की रणनीतिक ताकत का अहम हिस्सा बता चुके हैं। उनके मुताबिक पोसीडन ऐसा परमाणु सिस्टम है, जिसे मौजूदा मिसाइल डिफेंस या सोनार तकनीक से रोक पाना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि पश्चिमी देशों में इसे लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।
पोसीडन दरअसल परमाणु ऊर्जा से संचालित एक मानव रहित अंडरवॉटर व्हीकल है। इसे विशेष पनडुब्बियों से लॉन्च किया जाता है और यह समुद्र के भीतर हजारों किलोमीटर तक बिना रुके सफर कर सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका बेहद कम शोर पैदा करना है, जिससे दुश्मन के सोनार सिस्टम इसे आसानी से ट्रैक नहीं कर पाते। विशेषज्ञों के अनुसार, यह ड्रोन पारंपरिक नौसैनिक सुरक्षा घेरों को भी चकमा देने में सक्षम है।
सबसे खतरनाक पहलू इसकी तबाही मचाने की क्षमता है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अगर पोसीडन को किसी तटीय इलाके के पास विस्फोटित किया जाए, तो यह रेडियोधर्मी सुनामी पैदा कर सकता है। इस सुनामी से उठने वाली विशाल लहरें तटीय शहरों, बंदरगाहों और सैन्य ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर सकती हैं। इसके साथ ही समुद्री पानी में फैला रेडिएशन उस क्षेत्र को दशकों तक रहने लायक नहीं छोड़ेगा ।
अमेरिका और नाटो देशों ने इस हथियार को वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बताया है। कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के हथियार परमाणु संतुलन को और अस्थिर कर सकते हैं। हालांकि रूस का दावा है कि पोसीडन पूरी तरह से रक्षात्मक रणनीति का हिस्सा है और इसका उद्देश्य देश की सुरक्षा को मजबूत करना है।
फिलहाल, यह साफ है कि पोसीडन जैसे हथियार आधुनिक युद्ध की परिभाषा बदल रहे हैं। अगर भविष्य में इनका इस्तेमाल हुआ, तो उसका असर सिर्फ युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।