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अमेरिका में जज कुर्सी क्यों नहीं छोड़ते

अमेरिका में जज कुर्सी क्यों नहीं छोड़ते

Last Updated Jan - 06 - 2026, 03:48 PM | Source : Fela News

अस्सी नब्बे की उम्र में भी न्याय की कुर्सी पर बैठे जजों को देखकर अक्सर सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका में जज रिटायर क्यों नहीं होते
अमेरिका में जज कुर्सी क्यों नहीं छोड़ते
अमेरिका में जज कुर्सी क्यों नहीं छोड़ते

अमेरिका की न्याय व्यवस्था दुनिया की सबसे अलग और चर्चित प्रणालियों में से एक है। यहां अक्सर देखा जाता है कि 80 या 90 साल की उम्र पार कर चुके जज भी अदालतों में फैसले सुना रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है अमेरिका का संविधान, जिसमें जजों की रिटायरमेंट उम्र तय ही नहीं की गई है। खासकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को आजीवन पद पर रहने का अधिकार दिया गया है।

अमेरिकी संविधान के अनुसार, संघीय जज “गुड बिहेवियर” यानी अच्छे आचरण तक अपने पद पर बने रह सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक जज खुद इस्तीफा न दें, गंभीर अपराध में दोषी न ठहराए जाएं या महाभियोग के जरिए हटाए न जाएं, तब तक उन्हें पद से हटाया नहीं जा सकता। इसी कारण कई जज उम्र बढ़ने के बावजूद कुर्सी पर बने रहते हैं।

इस व्यवस्था के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि जजों को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखा जाए। अगर रिटायरमेंट उम्र तय होती, तो सरकारें या राजनीतिक दल जजों के फैसलों पर अप्रत्यक्ष असर डाल सकते थे। आजीवन नियुक्ति जजों को स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय लेने की ताकत देती है, ऐसा समर्थकों का मानना है।

हालांकि यह व्यवस्था विवादों से खाली नहीं है। आलोचकों का कहना है कि बहुत ज्यादा उम्र में जजों की सेहत और मानसिक क्षमता फैसलों को प्रभावित कर सकती है। कुछ मामलों में जजों के लंबे समय तक पद पर बने रहने से अदालतों में नए विचार और विविधता की कमी भी देखी जाती है। इसी वजह से अमेरिका में समय-समय पर रिटायरमेंट उम्र तय करने या कार्यकाल सीमित करने की मांग उठती रहती है।

एक और अहम पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और सीनेट इसकी मंजूरी देती है। जब कोई जज लंबे समय तक पद पर बना रहता है, तो नई नियुक्तियों का मौका कम हो जाता है। इससे अदालत का वैचारिक संतुलन दशकों तक एक ही दिशा में बना रह सकता है, जो राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन जाता है।

कुल मिलाकर, अमेरिका में जजों का रिटायर न होना किसी लापरवाही का नतीजा नहीं, बल्कि संविधान की सोच का हिस्सा है। यह व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए बनाई गई थी, लेकिन बदलते समय के साथ यह सवाल जरूर खड़ा कर रही है कि क्या उम्र और जिम्मेदारी के बीच कोई नई सीमा तय होनी चाहिए।

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