Last Updated May - 18 - 2026, 12:46 PM | Source : Fela News
होर्मुज संकट के बीच अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर राहत दी, जिससे कई देशों को बिना पेनल्टी पहले से लोड कार्गो खरीदने की छूट मिली. इससे ग्लोबल ऑयल मार्केट में हलचल तेज हो गई.
होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव और मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने पूरी दुनिया में तेल संकट को और गहरा कर दिया है. शुरुआत में भारत को बड़ी राहत मिली थी क्योंकि अमेरिका ने कुछ देशों के लिए रूसी तेल खरीद पर अस्थायी छूट दे दी थी. इसी वजह से भारत लगातार रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदता रहा और देश में पेट्रोल-डीजल की सप्लाई पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. लेकिन अब यह राहत खत्म होती नजर आ रही है क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने भारत के लिए रूसी तेल खरीद की छूट आगे नहीं बढ़ाई है.
भारत के लिए क्यों बढ़ी मुश्किल?
अमेरिका के इस फैसले ने भारत के एनर्जी सेक्टर की चिंता बढ़ा दी है. होर्मुज स्ट्रेट में टैंकरों की आवाजाही धीमी हो चुकी है और इंश्योरेंस खर्च भी तेजी से बढ़ गया है. इसका असर सीधे कच्चे तेल की कीमतों पर दिख रहा है. जो क्रूड पहले करीब 72 डॉलर प्रति बैरल था, वह अब 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है. ऐसे में भारत के लिए तेल आयात और महंगा हो सकता है.
रूस बना था भारत का सबसे बड़ा सहारा
यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन भारत और चीन ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा. रूस ने दोनों देशों को भारी डिस्काउंट पर तेल दिया. इससे भारत को महंगाई कंट्रोल करने में काफी मदद मिली. कई महीनों तक रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना रहा. मई महीने में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड 2.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था.
अब क्या होगा असर?
रूसी तेल पर छूट खत्म होने के बाद भारतीय रिफाइनरियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. अगर कंपनियां रूस से तेल खरीद कम करती हैं, तो उन्हें फिर से मिडिल ईस्ट पर निर्भर होना पड़ेगा, जहां पहले से तनाव चरम पर है. इससे भारत का इंपोर्ट बिल तेजी से बढ़ सकता है.
इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है. पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, एलपीजी सिलेंडर महंगा हो सकता है और हवाई किराए से लेकर ट्रांसपोर्ट खर्च तक बढ़ने की आशंका है.
सरकार के सामने क्या विकल्प?
सरकार टैक्स में कटौती या सब्सिडी देकर राहत दे सकती है, लेकिन इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा. दूसरा विकल्प यह है कि सरकारी तेल कंपनियां कुछ समय तक नुकसान सहें, लेकिन इससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है. अगर तेल संकट लंबा चला, तो भारत को फिर से ईंधन बचत जैसे पुराने कदम उठाने पड़ सकते हैं.
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