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अफगान-पाक जंग के बीच ‘दमादम मस्त कलंदर’ कैसे फिर से जिंदा हो उठा?

अफगान-पाक जंग के बीच ‘दमादम मस्त कलंदर’ कैसे फिर से जिंदा हो उठा?

Last Updated Feb - 27 - 2026, 03:16 PM | Source : Fela News

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सीमा संघर्ष के बीच 800 साल पुराना सूफी तराना ‘दमादम मस्त कलंदर’ सांस्कृतिक और विरोध-भावना का प्रतीक बनकर चर्चा में है, जो युद्ध की पृष्ठभूमि में फिर से उभर रहा है.
अफगान-पाक जंग के बीच ‘दमादम मस्त कलंदर’ कैसे फिर से जिंदा हो उठा?
अफगान-पाक जंग के बीच ‘दमादम मस्त कलंदर’ कैसे फिर से जिंदा हो उठा?

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर सैन्य टकराव के बीच 13वीं सदी का सूफी कलाम ‘दमादम मस्त कलंदर’ अचानक से प्रासंगिकता हासिल कर गया है. रिपोर्ट के अनुसार इस तराने को 13वीं सदी में अमीर खुसरो ने लिखा और यह सूफी संत लाल शाहबाज़ कलंदर (1177-1274) को समर्पित है, जिनकी दरगाह पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सेहवान शहर में स्थित है. इसे बाद में 18वीं सदी में बुल्ले शाह ने संवारा, जिससे यह क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख हिस्सा बन गया. 

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और मुकाबले के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा एम. आसिफ ने जंग के संदर्भ में कहा, “अब ये दमादम मस्त कलंदर होगा”, जिससे यह सूफी कलाम युद्ध-भावना और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में फिर से उभर आया है. इस बयान का उद्देश्य पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को मज़बूत और आत्मविश्वासी तरीके से प्रस्तुत करना बताया जा रहा है. 

यह तराना सिर्फ़ एक गीत नहीं रहा है, बल्कि इतिहास में इसे विरोध और विद्रोह का प्रतीक भी माना जाता रहा है. पाकिस्तान के एक अख़बार के मुताबिक़, जब सूफी परंपरा के लोग शाही दरबारों से अलग होने लगे थे, तब ‘कलंदर’ की परंपरा ने दरबार-कल्चर से दूरी रखी और इसी वजह से यह तराना राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों संदर्भों में महत्वपूर्ण रहा. 

इतिहासकारों के अनुसार यह कलाम आत्मा की आज़ादी, विरोध की भावना और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक रहा है, इसलिए यह आज भी समुदायों के बीच साझा सांस्कृतिक पहचान के रूप में गूँजता है. सेहवान की दरगाह पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही श्रद्धालु पारंपरिक सूफी धमाल करते हैं, जो धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर साझा आध्यात्मिकता को दर्शाता है. 

2017 में इसी दरगाह पर आतंकी संगठन इ슬ामिक स्टेट के हमले में कम से कम 88 लोगों की मौत हो गई थी, लेकिन इसके बाद भी स्थानीय लोगों ने पुलिस बैरिकेडिंग तोड़कर सूफी नृत्य ‘धमाल’ किया, जिसे आतंक के खिलाफ खुला विरोध माना गया. इस घटना ने भी ‘दमादम मस्त कलंदर’ को प्रतिरोध और चुनौती का प्रतीक बना दिया. 

‘दमादम मस्त कलंदर’ का प्रभाव सिर्फ़ पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा; यह उपमहाद्वीप भर में लोकप्रिय सूफी तराना है, जिसे कई कलाकारों ने अपनी अलग-अलग शैली में प्रस्तुत किया है और यह एक व्यापक सांस्कृतिक पुल के रूप में मौजूद है, जो मज़हबी सीमाओं से परे जा-कर आध्यात्मिक एकता और विद्रोह की भावना को व्यक्त करता है. 

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